पथराई निगाहों से अपनों का इंतजार करती एक हवेली...
ठूंठ-सी खड़ी, पथराई निगाहों से अपनों का इंतजार करती एक हवेली..। धूल से लथपथ हो रहे एक बस स्टेशन के पास की हवेली..। गाड़ियां आतीं, सवारियां उतारतीं और गुजर जातीं। हवा का हर झोंका इस हवेली को वो शाम याद दिलाता है.. बरसों से अकेली हवेली का मन उस दिन गाने को हो रहा था..। खुशियां हमेशा उदासी के आने का संकेत होती हैं ..हवेली शायद उस दिन शिद्दत से समझ गई थी.. वरना गए तो वहां से कई हैं..लेकिन वह इस बार ही क्यों रोई..?
उस पुरानी हवेली को देखने की इच्छा ने मुझे एक बार फिर राजस्थान पहुंचा दिया। जयपुर रेलवे स्टेशन से बाहर निकला तो पूरा शहर अलसाई सुबह से जाग ही रहा था। स्टेशन के सामने की चाय की दुकानों पर मेरे जैसे सैकड़ों यात्रियों का जमघट था। मुझे यहां से झुंझनू निकलना था। पांच घंटे के सफर के बाद मैं झुंझनू के बस स्टैंड पर था। इससे पहले भी कई बार इस शहर में आना हुआ। ऑटो लिया। भीड़भाड़ वाले बाजार में ऑटो ने उतारा तो बाजार में घूमते हुए मैं बार-बार आसपास खड़ी खूबसूरत हवेलियों की दीवारों को ही निहार रहा था। एक हवेली में घुसते ही उत्साह चरम पर था। खूबसूरत नक्काशी और पेंटिंग पहली ही नजर में आपको मंत्रमुग्ध कर सकती हैं। लकड़ी के बड़े से फाटक को पार किया तो सामने एक विशाल बरामदा हमारा इंतजार कर रहा था। मोदियों की हवेली में घुसते ही पूरा अतीत आपकी आंखों के सामने होता है। लेकिन यह आप तभी समझ सकते हैं, जब इन हवेलियों से आपका कोई रिश्ता हो।
हम भविष्य की चाह में वर्तमान में पहुंच गए हों, लेकिन ये हवेलियां आज भी अपने खूबसूरत अतीत में ही ठहरी हैं। यहां पहुंचने पर अतीत-वर्तमान में भेद करना आसान हो जाता है। लेकिन एक बात तो तय है कि यहां आकर आप अपने अतीत पर नाज कर सकते हैं। अपने पूर्वजों का तहेदिल से आभार व्यक्त करने का मौका ये बूढ़ी हवेलियां आपको देती हैं।
झुंझनू से एक घंटे के सफर के बाद मैं अपने पुरखों की जमीन पर था। लोगों से पूछते हुए मैं अपनी पुश्तैनी हवेली तक पहुंच चुका था। सैकड़ों कमरे वाली इस हवेली के अधिकांश कमरे ढह चुके थे और जो बचे थे, उस पर कब्जे हो चुके थे। जर्जर, पर बड़ी शान से खड़ी इस हवेली को देखकर अजीब-सा अहसास हुआ। परदादियों की हवेली खुश थी। बरसों बाद कोई अपना उसे देखने आया था। रात के अंधेरे में यह हवेली मुस्करा रही थी। अंदर घुसते ही सामने एक विशाल बरामदा। जिधर भी नजर घुमाओ, बंद कमरे। छतों पर मोरों का जमावड़ा। दीवारों को छुआ तो शरीर में सिहरन दौड़ गई। चांदनी रोशनी में नहाई हवेली रहस्यमयी लग रही थी। दिमाग में बस यही घूम रहा था कि मेरे जैसे कितने लोग अपनी जड़ों से दूर बैठे हैं।
हमारे दादा के दादा सूरजगढ़ से थे। हर मारवाड़ी की तरह वे पूर्व दिशा की ओर बढ़े। धीरे-धीरे सूरजगढ़ सिर्फ पुश्तैनी गांव ही बनकर रह गया। सिर्फ हवेलियों की तस्वीरें निहारने से आपको ये नहीं अपनाएंगी। इसके लिए आपको इन हवेलियों की दीवारों, झरोखों से बात करनी होगी। यकीन मानिए, ये आपको अपना लेंगी। राजस्थान में सैकड़ों ऐसी हवेलियां हैं, जो दर्द से कराह रही हैं। उन्हें बस अपनी उस युवा पीढ़ी का इंतजार है, जिन्होंने कभी अपनी बूढ़ी हवेलियों का ख्याल नहीं किया। हर बूढ़ी आंखों की तरह यह हवेलियां भी बाट जोह रही हैं अपनों का। बस इस ख्वाब के साथ कि कोई अपना आएगा और इन जर्जर दीवारों को फिर से खड़ा करवाएगा।
क्या ऐसा कभी होगा? या फिर अपने अतीत के साथ यह हवेलियां भविष्य की गोद में हमेशा हमेशा के लिए सो जाएंगी। सैकड़ों की तादाद में ऐसी हवेलियां भी हैं, जो शायद अगली बारिश भी न देख पाएं। हर दिन ये दीवारें ढह रही हैं। कभी रेतीली हवाएं तो कभी बारिश के कारण बूढ़ी और कमजोर हवेलियां हर रोज दम तोड़ रही हैं।
9/2/2012, दैनिक भास्कर


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