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पथराई निगाहों से अपनों का इंतजार करती एक हवेली...

Thursday 9 February 2012 Leave a Comment

ठूंठ-सी खड़ी, पथराई निगाहों से अपनों का इंतजार करती एक हवेली..। धूल से लथपथ हो रहे एक बस स्टेशन के पास की हवेली..। गाड़ियां आतीं, सवारियां उतारतीं और गुजर जातीं। हवा का हर झोंका इस हवेली को वो शाम याद दिलाता है.. बरसों से अकेली हवेली का मन उस दिन गाने को हो रहा था..। खुशियां हमेशा उदासी के आने का संकेत होती हैं ..हवेली शायद उस दिन शिद्दत से समझ गई थी.. वरना गए तो वहां से कई हैं..लेकिन वह इस बार ही क्यों रोई..?


उस पुरानी हवेली को देखने की इच्छा ने मुझे एक बार फिर राजस्थान पहुंचा दिया। जयपुर रेलवे स्टेशन से बाहर निकला तो पूरा शहर अलसाई सुबह से जाग ही रहा था। स्टेशन के सामने की चाय की दुकानों पर मेरे जैसे सैकड़ों यात्रियों का जमघट था। मुझे यहां से झुंझनू निकलना था। पांच घंटे के सफर के बाद मैं झुंझनू के बस स्टैंड पर था। इससे पहले भी कई बार इस शहर में आना हुआ। ऑटो लिया। भीड़भाड़ वाले बाजार में ऑटो ने उतारा तो बाजार में घूमते हुए मैं बार-बार आसपास खड़ी खूबसूरत हवेलियों की दीवारों को ही निहार रहा था। एक हवेली में घुसते ही उत्साह चरम पर था। खूबसूरत नक्काशी और पेंटिंग पहली ही नजर में आपको मंत्रमुग्ध कर सकती हैं। लकड़ी के बड़े से फाटक को पार किया तो सामने एक विशाल बरामदा हमारा इंतजार कर रहा था। मोदियों की हवेली में घुसते ही पूरा अतीत आपकी आंखों के सामने होता है। लेकिन यह आप तभी समझ सकते हैं, जब इन हवेलियों से आपका कोई रिश्ता हो।


हम भविष्य की चाह में वर्तमान में पहुंच गए हों, लेकिन ये हवेलियां आज भी अपने खूबसूरत अतीत में ही ठहरी हैं। यहां पहुंचने पर अतीत-वर्तमान में भेद करना आसान हो जाता है। लेकिन एक बात तो तय है कि यहां आकर आप अपने अतीत पर नाज कर सकते हैं। अपने पूर्वजों का तहेदिल से आभार व्यक्त करने का मौका ये बूढ़ी हवेलियां आपको देती हैं।

झुंझनू से एक घंटे के सफर के बाद मैं अपने पुरखों की जमीन पर था। लोगों से पूछते हुए मैं अपनी पुश्तैनी हवेली तक पहुंच चुका था। सैकड़ों कमरे वाली इस हवेली के अधिकांश कमरे ढह चुके थे और जो बचे थे, उस पर कब्जे हो चुके थे। जर्जर, पर बड़ी शान से खड़ी इस हवेली को देखकर अजीब-सा अहसास हुआ। परदादियों की हवेली खुश थी। बरसों बाद कोई अपना उसे देखने आया था। रात के अंधेरे में यह हवेली मुस्करा रही थी। अंदर घुसते ही सामने एक विशाल बरामदा। जिधर भी नजर घुमाओ, बंद कमरे। छतों पर मोरों का जमावड़ा। दीवारों को छुआ तो शरीर में सिहरन दौड़ गई। चांदनी रोशनी में नहाई हवेली रहस्यमयी लग रही थी। दिमाग में बस यही घूम रहा था कि मेरे जैसे कितने लोग अपनी जड़ों से दूर बैठे हैं।

हमारे दादा के दादा सूरजगढ़ से थे। हर मारवाड़ी की तरह वे पूर्व दिशा की ओर बढ़े। धीरे-धीरे सूरजगढ़ सिर्फ पुश्तैनी गांव ही बनकर रह गया। सिर्फ हवेलियों की तस्वीरें निहारने से आपको ये नहीं अपनाएंगी। इसके लिए आपको इन हवेलियों की दीवारों, झरोखों से बात करनी होगी। यकीन मानिए, ये आपको अपना लेंगी। राजस्थान में सैकड़ों ऐसी हवेलियां हैं, जो दर्द से कराह रही हैं। उन्हें बस अपनी उस युवा पीढ़ी का इंतजार है, जिन्होंने कभी अपनी बूढ़ी हवेलियों का ख्याल नहीं किया। हर बूढ़ी आंखों की तरह यह हवेलियां भी बाट जोह रही हैं अपनों का। बस इस ख्वाब के साथ कि कोई अपना आएगा और इन जर्जर दीवारों को फिर से खड़ा करवाएगा।


क्या ऐसा कभी होगा? या फिर अपने अतीत के साथ यह हवेलियां भविष्य की गोद में हमेशा हमेशा के लिए सो जाएंगी। सैकड़ों की तादाद में ऐसी हवेलियां भी हैं, जो शायद अगली बारिश भी न देख पाएं। हर दिन ये दीवारें ढह रही हैं। कभी रेतीली हवाएं तो कभी बारिश के कारण बूढ़ी और कमजोर हवेलियां हर रोज दम तोड़ रही हैं।


9/2/2012, दैनिक भास्कर

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आशीष महर्षि
Delhi, Delhi, India
एकला चलो रे की तर्ज पर चला जा रहा हूं। जिंदगी में कई दोस्त आए और लगातार आए ही जा रहे हैं। दोस्ती और दुश्मनों, सफलता और असफलता की परिभाषाओं से ऊपर उठ चुका हूं। आस्तिक हूं, यह बात बस पता है। भोले की नगरी में पैदाइश है, साथ में मन बड़ा चंचल तो गले में रूदाक्ष की माला पहनता हूं। सुना है कि इससे मन शांत रहता हूं। खुद को सभ्य समाज में व्यवस्थित करने का प्रयास करते हुए खुद के काम कर रहा हूं। राम, कृष्णा के प्रदेश यानि उत्तर प्रदेश के वाराणसी में जन्म। भोले की नगरी में बचपन बिता। घाट-घाट का पानी पीया। बचपन बनारस और आजमगढ़ में बीता। स्कूली ज्ञान भी इन्हीं दोनों शहरों से प्राप्त किया। बाद में राजस्थान के अलवर और जयपुर का रूख किया। कॉलेज की मस्ती तो नहीं, हां पढ़ाई यहां की। फिर जिंदगी के सफर में भोपाल के लिए रुख किया। यूनिवसिर्टी में पढ़ाई कम मस्ती अधिक की। जब भी अवसाद से घिरता हुआ तो कहानी, कविता और ब्लॉग लिखने बैठ जाता हूं। यकीन मानिए मेरी जिंदगी ही एक कविता है। जितना गुनगुनाएंगे, उतना ही समझते जाएंगे मुझे।
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