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हम जाहिल हैं, आरोप अच्छा है

Monday 21 November 2011 67 comments

आशुतोष

नया-नया जर्नलिज्म में आया था। अयोध्या का आंदोलन उफान पर था। बनारस में दंगे हुए थे। मुझे कवर करने के लिए भेजा गया था। वहां कुछ वरिष्ठ पत्रकारों से बातचीत हो रही थी। वे कह रहे थे कि पत्रकारिता की नई गंगा अब बनारस से निकलेगी। दंगों के दौरान की रिपोर्टिंग देख मैं पहले से ही सदमे में था। सब के सब उग्र हिंदूवादी रंग मे रंगे थे। रिपोर्ट के नाम पर अफवाहें खबर बन रही थीं। दिल्ली से जाने के बाद उन खबरों की पुष्टि मैंने कई बार करने की कोशिश की। हर बार प्रशासन ने कहा, तथ्यहीन। नामी-गिरामी अखबारों की खबर एक खास समुदाय को टारगेट करके, उनको विलेन बताने के मकसद से लिखी जाती थी। लौटकर मैंने एक छोटा-सा बॉक्स बनाया था, जिस पर एक अखबार के मालिक इतने नाराज हो उठे कि मेरी शिकायत संपादक से कर दी। संपादक जी की कृपा से मैं बच गया।

अयोध्या विवाद खत्म होते-होते मैं टीवी में आ गया। पहले सिर्फ दूरदर्शन था, सरकार का प्रेस रिलीज विभाग। निजी प्रोड्यूसरों ने खबरों को नया तेवर दिया। देखते-देखते दूरदर्शन के ये बुलेटिन फिनामिना बन गए। बुलेटिन से निकल कर टीवी चैनल में तब्दील हो गया। 2004 तक सब ठीक-ठाक चला। अचानक नंबर एक बनने की दौड़ शुरू हो गई और नई तरह की खबरों को परोसने का सिलसिला भी। सबसे पहले एमएमएस का बाजार गरम हुआ था। हर चैनल पर एमएमएस की खबरें ही दिखने लगीं। अपराध जगत की खबरों को सनसनीखेज तरीके से पेश करने का अंदाज भी इस दौर में ईजाद किया गया। नाट्य रूपांतरण होने लगे। मुझे याद है इस बीच एक वीडियो क्लिप करीना और शाहिद कपूर का कहीं सेलफोन वाले के हाथ लग गया था। ‘लिप टू लिप किस’ एक चैनल पर चला तो दूसरे भी कहां पीछे रहते। न तस्वीर को धुंधला किया गया और न पहचान छिपाने की कोशिश। न्यूजरूम में पहली बार विरोध के स्वर संपादकों को सुनने पड़े। असल रिपोर्टर दंग थे। नकल रिपोर्टर मस्त।

किसी चैनल पर चला कि फलां आदमी शाम चार बजे मरने वाला है। ओबी वैन दौडऩे लगीं। बेशर्म होकर पत्रकारों ने दिन भर उस शख्स पर लाइव किया। किसी ने एक और खबर निकाल ली। एक शख्स यमराज से मिल कर आया था। उसका लाइव भी खूब हुआ। इस बीच पुनर्जन्म की भी लॉटरी निकल आई। स्टूडियो में ऐसे गेस्ट लाने के लिए चैनलों के बीच मारपीट होने लगी। मंदिर का रहस्य सफलता की गांरटी हो गया।

नंबर वन की रेस और तेज हुई तो सांप-बिच्छू और भूत-प्रेत ने सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, आडवाणी की जगह ले ली। एलियन भी टीवी पर छाने लगे। नंबर वन की इस रेस में जब कुछ चैनल कामयाब हुए तो बाकी चैनलों ने भी यही आसान रास्ता पकड़ लिया। अब न्यूजरूम में हर शख्स खबरों की जगह टीआरपी की जुगाड़ में लग गया। एडिट मीटिंग्स में खबरों की जगह आधे घंटे के प्रोग्राम की बात होने लगी। रिपोर्टर की जगह स्ट्रिंगरों ने ले ली। चैनल अब एडिटर के हाथ से निकल कर असिस्टेंट प्रोड्यूसर के हाथ में चला गया। शायद ही कोई चैनल हो, जिसने ये रास्ता न पकड़ा हो या किसी न किसी रूप में इस रास्ते पर चलने की कोशिश न की हो। कुछ कामयाब थे और कुछ नाकामयाब। कोशिश सभी ने की थी। इन दिनों मंै अक्सर बनारस के उन दिनों को याद कर लिया करता था। खबरों की बलि तब भी चढ़ी थी। उस वक्त भी खबरों की जगह कहानी-किस्सों ने ली थी और इस दौर में भी। तब विचारधारा की आड़ में, इस दौर में टीआरपी की आड़ में बिसात बिछाई गई।

ऐसा नहीं था कि उस दौर में अच्छे अखबार और अच्छे पत्रकार नहीं थे। इस दौर में भी अच्छे चैनल और अच्छे पत्रकार थे। इस दौर में भी टीवी ने कुछ बहुत अच्छे काम किए थे। दहेज हत्या, स्त्री उत्पीडऩ, भ्रूण हत्या के खिलाफ जबरदस्त कैंपेन, सांप्रदायिकता का तगड़ा विरोध। दंगों को सनसनीखेज बनाने की कोशिश नहीं हुई। टीवी ने आम आदमी को बात कहने का एक मजबूत प्लेटफार्म दिया। घूस और भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़े-बड़े स्टिंग ऑपरेशन किए गए। पहली बार मंैने कैमरे को देख कर पुलिस और नौकरशाहों को कांपते देखा।

देश के एक कोने के त्योहार को देश के दूसरे कोने तक पहुंचाने का काम भी टीवी ने किया। गुजरात का गरबा बिहार पहुंच गया और बिहार का छठ महाराष्ट्र। दही-हांड़ी की तस्वीरें पूरे देश को रोमांचित करने लगीं। टीवी ने करवाचौथ को फैशनेबल बना दिया। नए तरह के सांस्कृतिक धागे में पूरे देश को बांधने का काम टीवी ने किया। लेकिन एलियन और सांप ने ऐसा बदनाम किया कि टीवी वालों के लिए मुंह छिपाना मुश्किल हो गया।

हैरत की बात यह है कि जब तक टीवी राखी सावंत और राजू श्रीवास्तव में व्यस्त था, सरकार की नींद नहीं टूटी लेकिन जैसे ही टीवी ने मुंबई हमलों पर सरकार की धज्जियां उड़ानी शुरू कीं, सरकार को लगा टीवी हदें पार कर रहा है। रेगुलेशन की बहस गति पकडऩे लगी।

सरकार जानती है अखबार और प्रेस की ताकत। उसे ऐसा मीडिया अच्छा लगता है जो उसकी तरफ ध्यान न दे। वह टीआरपी के खेल में उलझा रहेगा तो सरकार की कमजोरियों को नहीं उघाड़ेगा। उसके घोटाले नहीं दिखाएगा। लेकिन, मुंबई हमले ने टीवी के दिमाग को बदला। मैं नहीं कहता कि सारे टीवी वाले बदल गए लेकिन कुछ लोग सोचने के लिए मजबूर हुए। इंडस्ट्री के अंदरूनी दबाव ने भी धीरे-धीरे असर दिखाना शुरू किया। टीवी 2009 आने तक पटरी पर आता दिखा। अब सरकार के कान खड़े होने लगे। टीवी एक के बाद एक घोटालों को उजागर करने लगा। आईपीएल, कॉमनवेल्थ, आदर्श, २जी स्पेक्ट्रम घोटाले सामने आने लगे। टीवी ने बढ़-चढ़ के दिखाना शुरू किया। सरकार परेशान होने लगी। उसके खिलाफ माहौल बनने लगा। घाव में मिर्च लगी, जब अन्ना अनशन पर बैठे। टीवी ने उन्हें रातोरात उठा लिया।

अब टीवी पर लोकतंत्र विरोध के आरोप लगने लगे। रेगुलेशन की आवाज बुलंद होने लगी। कुछ ऐसे लोगों को छोड़ा जाने लगा, जो टीवी को जनहित विरोधी बताने लगे, सांप्रदायिकता बढ़ाने का दोष देने लगे। पत्रकार रिपोर्टर अपढ़ हो गए। जाहिल। लेकिन ये आरोप उन आरोपों से बेहतर हैं। उन आरोपों को सुनकर शर्म आती थी और आज गर्व से सीना चौड़ा होता है। मीडिया लोकतंत्र का चौथा खंभा है। वह अपनी भूमिका ठीक से निभाएगा तभी सरकारों और नेताओं को तकलीफ होगी। नेताओं को तकलीफ होगी तो लोकतंत्र जिंदा रहेगा। वरना नेता तो चाहते हैं कि लोकतंत्र सोता रहे।

लेखक आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडिटर हैं। साभार : दैनिक भास्कर
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न्यूज चैनल पर १क्क् करोड़ का जुर्माना : काटजू की नजर में सुप्रीम कोर्ट का आदेश गलत

Thursday 17 November 2011 14 comments

प्रेस काउंसिल के चेयरमैन जस्टिस मरकडेय काटजू ने टाइम्स नाउ चैनल के मामले में सुप्रीम कोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेशों को गलत बताया और उनपर पुनर्विचार का आग्रह किया है।

प्रेस दिवस के मौके पर बुधवार को एक सेमिनार में उन्होंने कहा कि इन दोनों आदेशों के प्रति पूरा सम्मान रखते हुए मेरा मत है कि ये गलत हैं और इनपर फिर से विचार की जरूरत है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल में अदालत की अवमानना के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश में किसी तरह का हस्तक्षेप से इनकार कर दिया है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस पीबी सावंत को 100 करोड़ रुपए की क्षतिपूर्ति देने के ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील की सुनवाई के पूर्व टाइम्स नाउ चैनल से 20 करोड़ रुपए नकद और 80 करोड़ रुपए की बैंक गारंटी देने का आदेश दिया है।

जस्टिस काटजू ने कहा कि चैनल से अनजाने में हुई गलती मानवीय चूक है और यह तकनीकी घालमेल के कारण हुआ और ऐसा प्रतीत नहीं होता कि इसके पीछे कोई दुर्भावना थी। उन्होंने कहा कि हम सभी इंसान हैं और हम सभी से गलती होती है। मेरी राय में उपयुक्त यही होता कि टीवी चैनल को कड़ी चेतावनी दे दी जाती कि भविष्य में सावधानी बरते।

जस्टिस काटजू ने कहा कि 100 करोड़ रुपए का जुर्माना अपराध के मुकाबले बहुत ज्यादा गैर आनुपातिक है। इसके लिए चैनल ने कई बार माफी भी मांगी है।

चैनल ने गाजियाबाद प्राविडेंट फंड घोटाले के सिलसिले में जस्टिस पीके सामंत की जगह पीबी सावंत की फोटो दिखा कर गलती की थी।
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ऐश्वर्या की बिटिया पर न्यूज चैनलों की रहस्यमयी चुप्पी

Wednesday 16 November 2011 2 comments

अमिताभ बच्चन की बहू ऐश्वर्या राय के मां बनने की खबर से चैनलों ने दूरी ही बनाई रखी। इसके पीछे मुख्य वजह उस गाइडलाइन को बताया जा रहा है जो ब्रॉडकास्ट एसोसिएशन ऑफ टेलीविजन जर्नलिस्ट की ओर से जारी की गई थी।
कुछेक चैनलों को छोड़ दें तो किसी भी चैनल ने बच्चन परिवार के नए मेहमान को लेकर एक शब्द भी नहीं चलाया। इलेक्ट्रानिक मीडिया के इतिहास में यह पहली बार हुआ, जब सभी चैनलों ने सर्वसहमति से इस खबर से दूर रहने का फैसला लिया।
एनडीटीवी के कार्यकारी संपादक रवीश कुमार कहते हैं कि बच्चन परिवार की बहू की प्रेग्नेंसी की कवरेज को लेकर ब्रॉडकास्ट एसोसिएशन ऑफ टेलीविजन जर्नलिस्ट ने कुछ नियम-कायदे बनाए हैं। बस इसी का पालन सभी चैनल कर रहे हैं।
हालांकि, मीडिया में यह भी चर्चा है कि पिछले कुछ दिनों में जिस प्रकार से अमिताभ बच्चन ने मीडिया को लेकर अपनी आपत्ति जताई थी, उससे भी मीडिया के सामने संकट खड़ा हो गया था। मीडिया को अपनी खोई प्रतिष्ठा फिर से पाने के लिए ऐसा कोई कदम उठाना जरूरी थी। कुछ दिनों पहले तक ऐश्वर्या की प्रेग्नेंसी और पैदा होने वाले बच्चे को लेकर इलेक्ट्रानिक मीडिया में कई तरह के कयास लगाए जा रहे थे। इन कयासों से बच्चन परिवार खासा खफा भी बताया जा रहा था।
वहीं, ब्रॉडकास्ट एसोसिएशन ऑफ टेलीविजन जर्नलिस्ट के महासचिव एन के सिंह कहते हैं कि हम नहीं चाहते थे कि मीडिया किसी के व्यक्तिगत जीवन में झांके। यही वजह रही है कि हमें ऐसी गाइडलाइन जारी करनी पड़ी। यदि अमिताभ प्रेस कांफ्रेस बुलाते हैं तो चैनल उसे जरूर कवर करेंगे।
क्या है ब्रॉडकास्ट एडिटर्स असोसिएशन (बीईए) का गाइडलाइंस

गाइडलाइंस में कहा गया कि बच्चन फैमिली में आने वाले नए मेहमान की कोई प्री-कवरेज नहीं की जाएगी ,बिना आधिकारिक घोषणा के कोई न्यूज भी ब्रेक नहीं की जाएगी। मतलब इस न्यूज को ब्रेकिंग न्यूज की तरह नहीं दिखाया जाएगा। इसके अलावा, हॉस्पिटल और बच्चन फैमिली के घर कोई कैमरामैन या ओबी वैन नहीं जाएगी। चैनल्स पर बच्चे का कोई एमएमएस या फोटो भी नहीं दिखाया जाएगा। बच्चन परिवार यदि कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाता है तभी पत्रकार जाएंगे। साथ ही बच्चे की बर्थडेट को लेकर कोई भविष्यवाणी भी प्रसारित नहीं की जाएगी। बेबी बच्चन की स्टोरी एक मिनट से ज्यादा की नहीं होगी।


दैनिक भास्कर डॉट कॉम, 16 सितंबर 2011
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भंवरी के भंवर में सब बह गए....

Tuesday 15 November 2011 1 comments

वीरों की भूमि कही जाने वाले रेतीले प्रदेश में इनदिनों भंवरी का बवंडर आया हुआ है। यह भवंडर अपने साथ पूरी राजस्थान सरकार को उखाड़कर ले गया। आखिरकार राजस्थान की भंवरी के भंवर में पूरी कांग्रेस चपेट में आ ही गई। न्यायपालिका, मीडिया, समाज, विपक्ष और आलाकमान के बढ़ते दबाव के बाद आखिरकार प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सभी मंत्रियों के इस्तीफे ले ही लिए। आखिर एक बात तो तय है कि इन मंत्रियों पर गहलोत का जादू नहीं बल्कि दिल्ली में बैठीं सोनिया गांधी का डंडा चला। वरना ये नेता इतनी आसानी से इस्तीफा नहीं देते। लेकिन अब सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है कि अब राजस्थान की राजनीति किस करवट बैठेगी।


बड़ी कठिन है डगर गहलोत की


राजस्थान की राजनीति और यहां के नेताओं को करीब से समझने के बाद एक बात तो कही जा सकती है कि कांग्रेस की राह आसान नहीं होगी। भाजपा के लिए खोने के पास नहीं है लेकिन पाने के लिए बहुत कुछ है। भाजपा हो या फिर कांग्रेस, दोनों ही कई खेमे में बंटी हुई है। हर बड़े नेता का अपना एक अलग खेमा है। यही वजह रही है न तो कभी वसुंधरा और न कभी गहलोत मजबूत नेता के तौर पर उभर सके। गहलोत ने भले ही कैबिनेट के सभी मंत्रियों से इस्तीफा ले लिया हो लेकिन नई कैबिनेट चुनने में उन्हें अच्छी खासी मशक्त करनी होगी। नई कैबिनेट में न सिर्फ जाति समीकरण का ख्याल रखना पड़ेगा बल्कि अलग-अलग क्षेत्र को भी तवज्जो देनी होगी। आलाकमान को इस बात का खास ख्याल रखना होगा कि कोई भी खेमा या जाति छूट न जाए। हालांकि, राजनीति के होशियार कांग्रेसी ऐसी कोई भूल करने वाली नहीं। यदि ऐसा हुआ तो यह राजनीतिक रूप से आत्महत्या के समान ही होगा।


भंवर में फंस ही गई गहलोत सरकार


खैर, भंवरी ने पहले ही भारतीय जनता पार्टी के एक विधायक को कथित रूप से कहा था कि उसके पास कुछ ऐसा मसाला है जो पूरी सरकार को सात दिन में गिरा सकती है। आखिरकार भंवरी ने पूरी सरकार को हिला ही दिया। लेकिन क्या भंवरी को न्याय मिल गया? क्या दोषियों को दंड मिल गया? इन दोनों सवालों का जवाब ना में ही होगा। राजस्थान की राजनीति को करीब से जानने वाले कहते हैं कि गहलोत के मंत्रियों के इस्तीफे से विपक्ष का वार थोड़ा कमजोर पड़ेगा। साथ में ही राजस्थान की जनता में गहलोत को लेकर सकारात्मकता बढ़ेगी।


नंगी सियासत


इसी के साथ सियासत जो नंगी हो कर खड़ी है, वह चिंजाजनक है। चूंकि, सियासत नंगी हुई है तो समाज भी नंगा हुआ है। सब मिलाकर समाज का दोगलापन, नेताओं की बेशर्मी और जनता की खामोशी, कुछ भी चौंकाने वाली नहीं है। राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर से भूचाल आया हुआ है। यह पहली बार है कि लगभग एक ही वक्त में दो ऐसी घटनाएं हो गईं, जिन्होंने प्रदेश के संवदेनशील मुख्यमंत्री के सामने संकट खड़ा कर दिया। जोधपुर की दलित नर्स भंवरी देवी के साथ जाट नेता और सरकार के कैबिनेट मंत्री महिपाल मदेरणा की कथित सीडी के आने के बाद पूरी सियासत ही नंगी हो गई है। जब सियासत में शराब और शबाब मिलता है जो ऐसा ही कुछ होता है। लेकिन चिंता का सबसे बड़ी वजह यह है कि जिस प्रकार से पूरे केस में भंवरी को बदनाम किया जा रहा है, वह है। कहा जा रहा है कि भंवरी ने मंत्री को ब्लैकमेल करने के लिए ब्लूफिल्म बनाई। आखिर हमें समझना होगा कि आखिर वह कौन सी वजह रही होगी, जब एक दलित महिला, जो नर्स से नीचे की पोस्ट पर काम करती है, उसका राज्य के मंत्री के साथ ऐसा संबंध बन पाया। आखिर भंवरी मंत्री तक पहुंची कैसे। आखिर क्यों मदरेणा अपने रिश्ते को छुपाते रहे? ऐसे कई सवाल हैं, जिनका ईमानदारी से जवाब तलाशना होगा।



राजनीति में पैसा-पावर-महात्वकांक्षा



राजनीति में पैसा-पावर-महात्वकांक्षा का सदियों से कॉकटेल रहा है। जैसे ही सियासत में किसी को पद मिलता है पैसा स्वत: ही उसके पास आने लगता है। पैसा औऱ पद का यही गठजोड़ व्यक्ति को बेलगाम बनाता है। उसकी महात्वकांक्षाएं बढ़ती चली जाती हैं। इसके अलावा उसके इर्द-गिर्द कई तरह के लोग इकट्ठे होना शुरू हो जाते हैं। उनके भी अपने-अपने हित होते हैं इसमें महिला या पुरूष कोई भी हो सकता है। धीरे-धीरे इर्द-गिर्द के इन लोगों का एंबीशन भी बढ़ता जाता है। कई बार किसी वीवीआईपी की कोई खास कमजोरी भी इन्हें पता चल जाती है। या कई दीगर कारणों से इनके खास हो जाते हैं। यहां से समीकरण खतरनाक बनने लगते हैं। वीवीआईपी अपने पद-पैसे के घमंड में बेलगाम होता है तो इर्द-गिर्द का आदमी उस वीवीआईपी के माध्यम से अपने हित साधने का प्रयास करता है। कई बार उसे सीढ़ी बनाकर आगे बढ़ने की कोशिश भी शुरू कर देता है। इस आपसी खेल के परिणाम कई बार बेहद घातक होते हैं जो इस प्रकरण में एक बार फिर स्पष्ट हुआ है।


हर खेमे-हर जाति का रखना होगा ख्याल


दूसरी सबसे बड़ी कड़ी, गहलोत सरकार से बड़ी बेआबरू होकर निकाले गए महिपाल मदेरणा उस जाति से आते हैं, जो राजस्थान की राजनीति को प्रभावित करती है। जोधपुर के इस जाट नेता का नाम जब पहली बार भंवरी के साथ जोड़ा गया तो किसी को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। लेकिन मदेरणा हर बार बचते रहे। लेकिन जब सीबीआई ने उनकी रासलीला का वीडियो दिखाया तो उन्होंने मान लिया कि हां, भंवरी और वे, कुछ अधिक करीब थे। मदेरणा पर आरोप है कि उन्होंने भंवरी को कई प्रकार का प्रलोभन देकर बरसों तक अपनी हवस की आग बुझाते रहे। इतना ही नहीं, बल्कि उन्होंने ही उसे गायब करवाया और फिर हत्या करवा दी। मामला सीबीआई के पास है। प्रदेश के मुख्यमंत्री पर जब दबाव पड़ा तो उन्होंने मदेरणा से इस्तीफा मांग लिया लेकिन मदेरणा जिद पर अड़े रहे और अंत में राजभवन के आदेश पर उन्होंने कुर्सी छोड़ी। कुर्सी छोड़ने के बाद भी उनकी अकड़ कम नहीं हुई। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 2०० सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे जबकि भाजपा ने १९३ और बसपा ने १९९ सीटों पर अपनी किस्मत अजमाई थी। वसुंधरा के कुशासन से पस्त जनता ने कांग्रेस को बहुमत के करीब तो लाया लेकिन बहुमत नहीं दिया। बसपा के सभी के सभी विधायक कांग्रेस में शामिल हुए और सत्ता पर कांग्रेस बैठी। जिसके बाद आंकड़ा बहुमत को छू पाया था। विधानसभा की दो सौ सीटों में से गहलोत सरकार के पास १क्२ विधायकों का समर्थन है। इसमें से छह ऐसे विधायक हैं जो बसपा का दामन छोड़कर कांग्रेस के साथ आए। जबकि विधानसभा में भाजपा के 79, वामपंथियों 3, सपा के एक, निर्दलिय 13, जेडीयू और लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के एक विधायक हैं।


भंवरी को बदनाम न करो


भंवरी को लेकर मीडिया में आया कि उसे लोग ऐश्वर्या राय कहते थे। बचपन से ही वह अति महत्वाकांक्षी थी। नट जाति की इस महिला ने जब जवानी की दहलीज पर कदम रखा तो महत्वाकांक्षा और हिलोरी खाने लगी। घरवालों की मर्जी के बगैर इसने प्रेम विवाह किया। अपनी खूबसूरती के कारण कई विधायक और मंत्री से उसके संबंध बने। अपने शरीर के बदले उसने बहुत कुछ पाया। लेकिन बढ़ती उम्र के कारण उसकी सुंदरता के पूजारी उससे दूर हटते गए। उसे समझ में आ गया था कि जवानी के अंतिम पड़ाव पर उसका साथ कोई नहीं देना वाला।


ऐसा लोगों का कहना है लेकिन इसे दूसरे रूप में देखने की भी आवश्यकता है। यदि मैं भंवरी को बेचारी कहूंगा तो कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है। ऐसे लोगों में अधिकांश वे लोग होंगे, जो महिलाओं को सदियों से कमोडिटी मानकर उपभोग करते रहे हैं। दोष उनका भी नहीं है। हमारे महान ग्रंथों से लेकर महाकाव्यों तक में हर बार कीमत महिलाओं ने ही चुकाई है। यकीन नहीं होता है तो सतयुग से त्रेतायुग तक चले जाइए। मसलन रामायण की सीता को देख लीजिए। महाभारत की कुंती, दौपद्री पर नजर डाल लीजिए। सृष्टि के रचियता माने जाने वाले ब्रह्मा और ज्ञान की देवी सरस्वती का संबंध पर नजर दौड़ा लीजिए। हर बार भोगना सिर्फ और सिर्फ महिलाओं को ही पड़ा।



महिला आंदोलन में एक थ्यौरी बड़ी प्रचलित है- ट्रेपिंग इन इमोशनल। यानि एक महिला की भावनाओं पर नियंत्रण करते हुए उसे अपने चंगुल में फंसाना। आखिर क्या आप उम्मीद कर सकते हैं कि राज्य के मंत्री और कुछेक हजार कमाने वाली महिला में कोई संबंध हो सकता है। आखिर ऐसी कौन सी वजह थी कि एक महिला को अपने ही उन पलों की सीडी बनानी पड़ी, जो बड़े खास होते हैं। भंवरी जिस जाति से आती है, उसे लेकर भी मीडिया के एक तबके का कहना है कि नट जाति के लोग बड़े खुले मिजाज के होते हैं। लेकिन कोई नट जाति के अतीत और वर्तमान को टटोलने की कोशिश नहीं करता है। नट जाति की कोई लड़की या फिर लड़का पढ़ना चाहता है तो समाज उसे स्वीकार नहीं करता। गांवों के बाहर उनके टूटे-फूटे घर बने होते हैं। सबकुछ हारने के बाद उनके पास अपने जिस्म को बेचने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता है।
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आशीष महर्षि
Delhi, Delhi, India
एकला चलो रे की तर्ज पर चला जा रहा हूं। जिंदगी में कई दोस्त आए और लगातार आए ही जा रहे हैं। दोस्ती और दुश्मनों, सफलता और असफलता की परिभाषाओं से ऊपर उठ चुका हूं। आस्तिक हूं, यह बात बस पता है। भोले की नगरी में पैदाइश है, साथ में मन बड़ा चंचल तो गले में रूदाक्ष की माला पहनता हूं। सुना है कि इससे मन शांत रहता हूं। खुद को सभ्य समाज में व्यवस्थित करने का प्रयास करते हुए खुद के काम कर रहा हूं। राम, कृष्णा के प्रदेश यानि उत्तर प्रदेश के वाराणसी में जन्म। भोले की नगरी में बचपन बिता। घाट-घाट का पानी पीया। बचपन बनारस और आजमगढ़ में बीता। स्कूली ज्ञान भी इन्हीं दोनों शहरों से प्राप्त किया। बाद में राजस्थान के अलवर और जयपुर का रूख किया। कॉलेज की मस्ती तो नहीं, हां पढ़ाई यहां की। फिर जिंदगी के सफर में भोपाल के लिए रुख किया। यूनिवसिर्टी में पढ़ाई कम मस्ती अधिक की। जब भी अवसाद से घिरता हुआ तो कहानी, कविता और ब्लॉग लिखने बैठ जाता हूं। यकीन मानिए मेरी जिंदगी ही एक कविता है। जितना गुनगुनाएंगे, उतना ही समझते जाएंगे मुझे।
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