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भंवरी के भंवर में सब बह गए....

Tuesday 15 November 2011 Leave a Comment

वीरों की भूमि कही जाने वाले रेतीले प्रदेश में इनदिनों भंवरी का बवंडर आया हुआ है। यह भवंडर अपने साथ पूरी राजस्थान सरकार को उखाड़कर ले गया। आखिरकार राजस्थान की भंवरी के भंवर में पूरी कांग्रेस चपेट में आ ही गई। न्यायपालिका, मीडिया, समाज, विपक्ष और आलाकमान के बढ़ते दबाव के बाद आखिरकार प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सभी मंत्रियों के इस्तीफे ले ही लिए। आखिर एक बात तो तय है कि इन मंत्रियों पर गहलोत का जादू नहीं बल्कि दिल्ली में बैठीं सोनिया गांधी का डंडा चला। वरना ये नेता इतनी आसानी से इस्तीफा नहीं देते। लेकिन अब सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है कि अब राजस्थान की राजनीति किस करवट बैठेगी।


बड़ी कठिन है डगर गहलोत की


राजस्थान की राजनीति और यहां के नेताओं को करीब से समझने के बाद एक बात तो कही जा सकती है कि कांग्रेस की राह आसान नहीं होगी। भाजपा के लिए खोने के पास नहीं है लेकिन पाने के लिए बहुत कुछ है। भाजपा हो या फिर कांग्रेस, दोनों ही कई खेमे में बंटी हुई है। हर बड़े नेता का अपना एक अलग खेमा है। यही वजह रही है न तो कभी वसुंधरा और न कभी गहलोत मजबूत नेता के तौर पर उभर सके। गहलोत ने भले ही कैबिनेट के सभी मंत्रियों से इस्तीफा ले लिया हो लेकिन नई कैबिनेट चुनने में उन्हें अच्छी खासी मशक्त करनी होगी। नई कैबिनेट में न सिर्फ जाति समीकरण का ख्याल रखना पड़ेगा बल्कि अलग-अलग क्षेत्र को भी तवज्जो देनी होगी। आलाकमान को इस बात का खास ख्याल रखना होगा कि कोई भी खेमा या जाति छूट न जाए। हालांकि, राजनीति के होशियार कांग्रेसी ऐसी कोई भूल करने वाली नहीं। यदि ऐसा हुआ तो यह राजनीतिक रूप से आत्महत्या के समान ही होगा।


भंवर में फंस ही गई गहलोत सरकार


खैर, भंवरी ने पहले ही भारतीय जनता पार्टी के एक विधायक को कथित रूप से कहा था कि उसके पास कुछ ऐसा मसाला है जो पूरी सरकार को सात दिन में गिरा सकती है। आखिरकार भंवरी ने पूरी सरकार को हिला ही दिया। लेकिन क्या भंवरी को न्याय मिल गया? क्या दोषियों को दंड मिल गया? इन दोनों सवालों का जवाब ना में ही होगा। राजस्थान की राजनीति को करीब से जानने वाले कहते हैं कि गहलोत के मंत्रियों के इस्तीफे से विपक्ष का वार थोड़ा कमजोर पड़ेगा। साथ में ही राजस्थान की जनता में गहलोत को लेकर सकारात्मकता बढ़ेगी।


नंगी सियासत


इसी के साथ सियासत जो नंगी हो कर खड़ी है, वह चिंजाजनक है। चूंकि, सियासत नंगी हुई है तो समाज भी नंगा हुआ है। सब मिलाकर समाज का दोगलापन, नेताओं की बेशर्मी और जनता की खामोशी, कुछ भी चौंकाने वाली नहीं है। राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर से भूचाल आया हुआ है। यह पहली बार है कि लगभग एक ही वक्त में दो ऐसी घटनाएं हो गईं, जिन्होंने प्रदेश के संवदेनशील मुख्यमंत्री के सामने संकट खड़ा कर दिया। जोधपुर की दलित नर्स भंवरी देवी के साथ जाट नेता और सरकार के कैबिनेट मंत्री महिपाल मदेरणा की कथित सीडी के आने के बाद पूरी सियासत ही नंगी हो गई है। जब सियासत में शराब और शबाब मिलता है जो ऐसा ही कुछ होता है। लेकिन चिंता का सबसे बड़ी वजह यह है कि जिस प्रकार से पूरे केस में भंवरी को बदनाम किया जा रहा है, वह है। कहा जा रहा है कि भंवरी ने मंत्री को ब्लैकमेल करने के लिए ब्लूफिल्म बनाई। आखिर हमें समझना होगा कि आखिर वह कौन सी वजह रही होगी, जब एक दलित महिला, जो नर्स से नीचे की पोस्ट पर काम करती है, उसका राज्य के मंत्री के साथ ऐसा संबंध बन पाया। आखिर भंवरी मंत्री तक पहुंची कैसे। आखिर क्यों मदरेणा अपने रिश्ते को छुपाते रहे? ऐसे कई सवाल हैं, जिनका ईमानदारी से जवाब तलाशना होगा।



राजनीति में पैसा-पावर-महात्वकांक्षा



राजनीति में पैसा-पावर-महात्वकांक्षा का सदियों से कॉकटेल रहा है। जैसे ही सियासत में किसी को पद मिलता है पैसा स्वत: ही उसके पास आने लगता है। पैसा औऱ पद का यही गठजोड़ व्यक्ति को बेलगाम बनाता है। उसकी महात्वकांक्षाएं बढ़ती चली जाती हैं। इसके अलावा उसके इर्द-गिर्द कई तरह के लोग इकट्ठे होना शुरू हो जाते हैं। उनके भी अपने-अपने हित होते हैं इसमें महिला या पुरूष कोई भी हो सकता है। धीरे-धीरे इर्द-गिर्द के इन लोगों का एंबीशन भी बढ़ता जाता है। कई बार किसी वीवीआईपी की कोई खास कमजोरी भी इन्हें पता चल जाती है। या कई दीगर कारणों से इनके खास हो जाते हैं। यहां से समीकरण खतरनाक बनने लगते हैं। वीवीआईपी अपने पद-पैसे के घमंड में बेलगाम होता है तो इर्द-गिर्द का आदमी उस वीवीआईपी के माध्यम से अपने हित साधने का प्रयास करता है। कई बार उसे सीढ़ी बनाकर आगे बढ़ने की कोशिश भी शुरू कर देता है। इस आपसी खेल के परिणाम कई बार बेहद घातक होते हैं जो इस प्रकरण में एक बार फिर स्पष्ट हुआ है।


हर खेमे-हर जाति का रखना होगा ख्याल


दूसरी सबसे बड़ी कड़ी, गहलोत सरकार से बड़ी बेआबरू होकर निकाले गए महिपाल मदेरणा उस जाति से आते हैं, जो राजस्थान की राजनीति को प्रभावित करती है। जोधपुर के इस जाट नेता का नाम जब पहली बार भंवरी के साथ जोड़ा गया तो किसी को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। लेकिन मदेरणा हर बार बचते रहे। लेकिन जब सीबीआई ने उनकी रासलीला का वीडियो दिखाया तो उन्होंने मान लिया कि हां, भंवरी और वे, कुछ अधिक करीब थे। मदेरणा पर आरोप है कि उन्होंने भंवरी को कई प्रकार का प्रलोभन देकर बरसों तक अपनी हवस की आग बुझाते रहे। इतना ही नहीं, बल्कि उन्होंने ही उसे गायब करवाया और फिर हत्या करवा दी। मामला सीबीआई के पास है। प्रदेश के मुख्यमंत्री पर जब दबाव पड़ा तो उन्होंने मदेरणा से इस्तीफा मांग लिया लेकिन मदेरणा जिद पर अड़े रहे और अंत में राजभवन के आदेश पर उन्होंने कुर्सी छोड़ी। कुर्सी छोड़ने के बाद भी उनकी अकड़ कम नहीं हुई। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 2०० सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे जबकि भाजपा ने १९३ और बसपा ने १९९ सीटों पर अपनी किस्मत अजमाई थी। वसुंधरा के कुशासन से पस्त जनता ने कांग्रेस को बहुमत के करीब तो लाया लेकिन बहुमत नहीं दिया। बसपा के सभी के सभी विधायक कांग्रेस में शामिल हुए और सत्ता पर कांग्रेस बैठी। जिसके बाद आंकड़ा बहुमत को छू पाया था। विधानसभा की दो सौ सीटों में से गहलोत सरकार के पास १क्२ विधायकों का समर्थन है। इसमें से छह ऐसे विधायक हैं जो बसपा का दामन छोड़कर कांग्रेस के साथ आए। जबकि विधानसभा में भाजपा के 79, वामपंथियों 3, सपा के एक, निर्दलिय 13, जेडीयू और लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के एक विधायक हैं।


भंवरी को बदनाम न करो


भंवरी को लेकर मीडिया में आया कि उसे लोग ऐश्वर्या राय कहते थे। बचपन से ही वह अति महत्वाकांक्षी थी। नट जाति की इस महिला ने जब जवानी की दहलीज पर कदम रखा तो महत्वाकांक्षा और हिलोरी खाने लगी। घरवालों की मर्जी के बगैर इसने प्रेम विवाह किया। अपनी खूबसूरती के कारण कई विधायक और मंत्री से उसके संबंध बने। अपने शरीर के बदले उसने बहुत कुछ पाया। लेकिन बढ़ती उम्र के कारण उसकी सुंदरता के पूजारी उससे दूर हटते गए। उसे समझ में आ गया था कि जवानी के अंतिम पड़ाव पर उसका साथ कोई नहीं देना वाला।


ऐसा लोगों का कहना है लेकिन इसे दूसरे रूप में देखने की भी आवश्यकता है। यदि मैं भंवरी को बेचारी कहूंगा तो कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है। ऐसे लोगों में अधिकांश वे लोग होंगे, जो महिलाओं को सदियों से कमोडिटी मानकर उपभोग करते रहे हैं। दोष उनका भी नहीं है। हमारे महान ग्रंथों से लेकर महाकाव्यों तक में हर बार कीमत महिलाओं ने ही चुकाई है। यकीन नहीं होता है तो सतयुग से त्रेतायुग तक चले जाइए। मसलन रामायण की सीता को देख लीजिए। महाभारत की कुंती, दौपद्री पर नजर डाल लीजिए। सृष्टि के रचियता माने जाने वाले ब्रह्मा और ज्ञान की देवी सरस्वती का संबंध पर नजर दौड़ा लीजिए। हर बार भोगना सिर्फ और सिर्फ महिलाओं को ही पड़ा।



महिला आंदोलन में एक थ्यौरी बड़ी प्रचलित है- ट्रेपिंग इन इमोशनल। यानि एक महिला की भावनाओं पर नियंत्रण करते हुए उसे अपने चंगुल में फंसाना। आखिर क्या आप उम्मीद कर सकते हैं कि राज्य के मंत्री और कुछेक हजार कमाने वाली महिला में कोई संबंध हो सकता है। आखिर ऐसी कौन सी वजह थी कि एक महिला को अपने ही उन पलों की सीडी बनानी पड़ी, जो बड़े खास होते हैं। भंवरी जिस जाति से आती है, उसे लेकर भी मीडिया के एक तबके का कहना है कि नट जाति के लोग बड़े खुले मिजाज के होते हैं। लेकिन कोई नट जाति के अतीत और वर्तमान को टटोलने की कोशिश नहीं करता है। नट जाति की कोई लड़की या फिर लड़का पढ़ना चाहता है तो समाज उसे स्वीकार नहीं करता। गांवों के बाहर उनके टूटे-फूटे घर बने होते हैं। सबकुछ हारने के बाद उनके पास अपने जिस्म को बेचने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता है।

1 comments »

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    16 November 2011 2:07 PM
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    एकला चलो रे की तर्ज पर चला जा रहा हूं। जिंदगी में कई दोस्त आए और लगातार आए ही जा रहे हैं। दोस्ती और दुश्मनों, सफलता और असफलता की परिभाषाओं से ऊपर उठ चुका हूं। आस्तिक हूं, यह बात बस पता है। भोले की नगरी में पैदाइश है, साथ में मन बड़ा चंचल तो गले में रूदाक्ष की माला पहनता हूं। सुना है कि इससे मन शांत रहता हूं। खुद को सभ्य समाज में व्यवस्थित करने का प्रयास करते हुए खुद के काम कर रहा हूं। राम, कृष्णा के प्रदेश यानि उत्तर प्रदेश के वाराणसी में जन्म। भोले की नगरी में बचपन बिता। घाट-घाट का पानी पीया। बचपन बनारस और आजमगढ़ में बीता। स्कूली ज्ञान भी इन्हीं दोनों शहरों से प्राप्त किया। बाद में राजस्थान के अलवर और जयपुर का रूख किया। कॉलेज की मस्ती तो नहीं, हां पढ़ाई यहां की। फिर जिंदगी के सफर में भोपाल के लिए रुख किया। यूनिवसिर्टी में पढ़ाई कम मस्ती अधिक की। जब भी अवसाद से घिरता हुआ तो कहानी, कविता और ब्लॉग लिखने बैठ जाता हूं। यकीन मानिए मेरी जिंदगी ही एक कविता है। जितना गुनगुनाएंगे, उतना ही समझते जाएंगे मुझे।
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