जंगल के अपने नियम-कायदे होते हैं

बांधवगढ़ में दो बाघ एक इंसान को मारकर खा गए। एसएमएस में बस इतना ही लिखा था। काफी हंगामा मचा। अखबारों में खबरें आईं। आगामी हालात के बारे में कयास लगाए गए। लेकिन उस एसएमएस ने एक बार फिर मुझे बांधवगढ़ पहुंचा दिया। अपनी फैलोशिप के दौरान कई बार वहां के चक्कर लगाए थे, लेकिन कभी आदमखोर बाघों के बारे में नहीं सुना। बांधवगढ़ नेशनल पार्क में मैंने एक बाघिन को उसके दो शावकों के संग देखा था, लेकिन पलभर को भी यह ख्याल नहीं आया था कि वे आदमखोर हो सकते हैं। कई महीनों पहले मध्यप्रदेश और राजस्थान के कई टाइगर रिजर्व में घूमते हुए जंगल और बाघों को समझने का प्रयास किया, लेकिन बांधवगढ़ जैसा अनुभव अनूठा था। जंगलों की खाक छानते हुए एक बात तो साफ समझ में आ गई कि जंगल का अपना कानून होता है। यदि आपको जंगलों में रहना है तो वहां का अलिखित कानून मानना ही पड़ेगा। नहीं मानें तो कीमत चुकानी पड़ सकती है। जब जंगल के राजा से आमने-सामने मुलाकात करनी हो, वह भी खुले जंगल में पैदल चलते हुए, तो जोखिम बढ़ ही जाता है। बांधवगढ़ के अंदर बसे कल्लवाह गांव पहुंचा तो गांव वालों ने बताया कि पास में ही एक बाघिन ने एक गाय का शिकार किया है। साथ में बाघिन के दो शावक भी देखे जाने की बात सुनी तो शरीर में एक सिहरन-सी दौड़ गई। मैं रोमांच से भर उठा। मैंने जब अपने साथ बैठे डिप्टी रेंजर से उस बाघिन को देखने की इच्छा जताई तो उन्होंने हामी भर दी। घने जंगलों के बीच गाड़ी को कच्चे मार्ग से उतारकर जब हम धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे तो दिल की धड़कन तेज होती जा रही थी, लेकिन गाड़ी की रफ्तार कम होती जा रही थी। बाद में गाड़ी छोड़कर हमें कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। मन में डर तो था, लेकिन खुलेआम बाघिन से आमना-सामना करने का लालच मैं नहीं छोड़ सकता था। हाथों में जब कैमरा लेकर गाड़ी से उतरने लगा था तो मुझे कहा गया कि ये गलती मत कीजिए। आपके कैमरे से परेशानी हो सकती है। न चाहते हुए भी कैमरे को गाड़ी में छोड़ना पड़ा। करीब दो किलोमीटर चलने के बाद मुझसे कहा गया, बस साहब अब कोई आवाज मत निकालिएगा। फिर बहते नाले और घाटी के बीच एक खोह में डिप्टी रेंजर ने मुझे झांकने को कहा। पहली बार खुले जंगल में एक बाघिन मेरे सामने थी। साथ में उसके दो शावक। अचानक बाघिन ने ऊपर देखा तो कलेजा मुंह को आ गया। वह हमें ही देख रही थी। पता नहीं, अगले पल क्या कर बैठे। लेकिन उसने बड़ी बेफिक्री के साथ हमें नजरअंदाज कर दिया। करीब 10 मिनट तक उसे निहारने के बाद हमें लौटना पड़ा। थका देने वाले सफर के बावजूद दिल में खुशी थी। खुले जंगल में बाघिन के परिवार से आंखें दो-चार करके जो लौट रहा था। सब शांति से निपट गया। मैं वापस लौट आया। कहानी में खास क्या है? खास है डिप्टी रेंजर की बात। उसने कहा था कि साहब आपको एक ही शर्त पर उस बाघिन के पास ले चलूंगा। आप कोई फोटो नहीं खींचेंगे। शोर नहीं करेंगे। हम उनके इलाके में जा रहे हैं, यानी एक तरह से अतिक्रमण कर रहे हैं। जितनी शांति बरतेंगे, हमारे लिए उतना ही बेहतर होगा। जानवर कभी अपनी मर्यादा नहीं भूलते। दुर्घटना तभी होती है, जब इंसान अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करता है। यह अतिक्रमण उन्हें हिंसक बना देता है। ऐसी हर खबर पर मैं यही सोचता हूं कि मर्यादा कौन भूला होगा!

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