एक और अफगानिस्तान न बन जाए लीबिया !
लीबिया में अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस की सेना लीबिया के लोगों को बचाने के लिए पूरी मुस्तैदी से गद्दाफी की सेना से लड़ रही है। इनका लक्ष्य एक ही है, बस मानवता के नाते जनता को गद्दाफी के जुल्मों से बचाया जाए। कम से कम अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आ रही हैं खबरों से तो ऐसा ही प्रतीक हो रहा है। विश्व के किसी भी कोने में जुल्म बढ़ेगा तो वे उसे मिटाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोडं़ेगे। लेकिन क्या यह वाकई में सही है?
इस मुद्दे पर अमेरिका और ब्रिटेन के पुराने इतिहास को खंगालें तो बिना फायदे के ये देश कुछ नहीं करते हैं। इराक और अफगानिस्तान से लेकर वियतनाम तक इसके उदाहरण हैं। लेकिन फिर भी लीबिया को बचाने के लिए दुनिया के आका सामने आ चुके हैं। लीबिया में जो हो रहा है, उसे बिल्कुल जायज नहीं ठहराया जा सकता है लेकिन आगे वहां अमेरिका-ब्रिटेन लीबिया को गद्दाफी से मुक्त कराके वहां नई लोकतांत्रिक सरकार बनाने में मदद करेंगे? कहीं वैसी सरकार तो नहीं, जो अफगानिस्तान में बनाई गई थी। यह पूरी दुनिया जानती है कि किस प्रकार अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश ने इराक और अफगानिस्तान को दुनिया में शांति कायम करने के नाम पर तहस-नहस करवा दिया।
लेकिन जब अमेरिका में नए राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा की ताजपोशी हुई थी तो पूरी दुनिया को लगा कि एक अश्वेत क्रांति फिर से जन्म ले रही है। लेकिन जिस तरह लीबिया में बमबारी की जा रही है, उससे एक बार फिर से अमेरिका-ब्रिटेन का असली चेहरा सामने आ गया है। लीबिया की सड़कों पर जनता आमने सामने है। एक तरफ गद्दाफी समर्थक हैं तो दूसरी ओर गद्दाफी की नीतियों से पस्त आवाम। लेकिन भुगतना दोनों को ही पड़ रहा है। मिस्त्र से फैली यह आग लीबिया तक पहुंचने में कुछ ही दिन लगी।
लेकिन चिंगारी अंदर ही अंदर भड़क रही थी। बराक ओबामा भी जानते हैं कि दूसरे के मामले में टांग अड़ाने का तब तक कोई अर्थ नहीं है जब तक कोई फायदा नहीं हो। अपने राष्ट्रपति की बातों से अमरीकी विदेशमंत्री रॉबर्ट गेट्स भी इतेफाक रखते हैं। अब देखना यह है कि कब और कैसे अमेरिका और ब्रिटेन लीबिया से दूर होते हैं? अमेरिका और ब्रिटेन के इतिहास को देखकर नहीं लगता है कि ये देश लीबिया से खाली हाथ चले जाएंगे।
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