साहब हमें तो उजाड़ दिया, अब शेर को तो बसाओ
आशीष महर्षि
दस साल पहले एशियाई शेरों को बसाने के नाम पर उजाड़े गए हजारों लोग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। हजारों परिवारों को इस बात का सबसे अधिक दुख है कि जिन शेरों के नाम पर उन्हें अपने ही गांवों से बेदखल किया गया, वहां आज तक शेर नहीं आ पाया है। केंद्र सरकार मध्य प्रदेश के श्योपुरी जिले में स्थित पालपुर कुनो में गुजरात से एशियाई शेरों को लाने के लिए दस साल पहले 28 गांवों के 6500 परिवारों को विस्थापित किया था। उस वक्त उनसे वादा किया गया था कि नए गांव में वे सभी सुविधाओं को उपलबध कराया जाएगा, जिससे वे महरुम हैं। लेकिन ऐसा हो नहीं सका।विस्थापित गांवों में से एक श्योपुर जिले के चक्र पारोंद गांव के पूर्व सरपंच सुजात सिंह कहते हैं कि सरकार ने शेरों के लिए हमें तो उजाड़ दिया लेकिन आज तक शेर नहीं ला पाई। हमारे गांव के कई टुकड़े हो गए, अब अपने ही गांव से बेदखल हो गए लेकिन हमारी तकलीफ कम होने की बजाय बढ़ती गई।
सुजात सिंह का 18 वर्ष का बेटा सत्यम सिंह आज भी बचपन की बातें याद कर बैचेन हो उठता है। सत्यम कहता है कि जब हम जंगल में तो जीने का अलग ही मजा था। कूनो नदी के किनारे बिताते अपने पुराने दिनों को याद करते हुए सत्यम कहता है कि उस गांव में पानी की कोई कमी नहीं थी लेकिन नए गांव में न तो पानी है और उपयुक्त खेती। बस किसी तरह काम चल रहा है। सत्यम का बाल विवाह हुआ था जिसके कारण उसे तीन बच्चे हैं। 12 वीं तक पढ़े सत्यम को अब अपने बच्चों को पढ़ाने की चिंता सता रही है लेकिन सत्यम के पिता सुजात सिंह इससे बेखबर हैं। उनका कहना है कि बच्चों की किस्मत में पढ़ना होगा, तो पढ़ लेंगे।
विस्थापितों की लड़ाई लड़ रहे विस्थापित संघर्ष समिति के अध्यक्ष रघु लाल जाटव कहते हैं कि आज से करीब दस साल पहले जब हमारे गांवों को उजाड़ा जा रहा था तो हमसे अच्छी जमीन, पानी, अस्पताल की बात कही गई थी, लेकिन न तो अच्छी जमीन मिली और न पानी। खेतों में थोड़ी बहुत गेहूं की फसल खड़ी है लेकिन यदि गर्मी ऐसे ही बढ़ती गई तो सबकुछ चौपट हो जाएगा।
जब मैंने जब अभ्यारण के बाहर बसे गांवों का दौरा किया तो कमोबेश हर तरह एक जैसी स्थिति दिखी। महीने में एक बार राशन की दुकान खुली। शेरजहां दस-दस किलोमीटर दूर से बूढ़े, महिलाएं और बच्चे मिट्टी का तेल और अनाज लेने पहुंचे हुए थे। इन्हीं में से एक था पोसू। पोसू पालपुर गांव का रहने वाला है। वह कहता है कि हम तो खेती-बाड़ी कर अपना गुजारा कर लेते हैं लेकिन इस बार गर्मी के कारण यह भी मुश्किल लग रही है। ऐसा ही कुछ कहना है कि टपरपुरा गांव के पूरण का। पूरण कहता है कि हमें सरकार की ओर से नौ बीघा जमीन मिली थी लेकिन हमारी पहुंच ऊपर तक नहीं थी तो हमें पत्थर वाली जमीन मिली। इसमें खेती करने का कोई मतलब नहीं है। हम तो मजदूरी करके ही अपने परिवार का पेट भरते हैं। जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती जाएगी, इस पूरे इलाके से विस्थापित लोगों का पलायान भी शुरू हो जाएगा। पूरण कहता है कि मार्च-अप्रैल में सरसों के कटने के बाद गांव के गांव खाली हो जाएंगे। हम सभी आसपास के जिलों में मजदूरी करने चले जाएंगे। इन आदिवासियों से जब केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना महात्मा गांधी रोजगार गारंटी के बारे में पूछा गया तो सब इससे नाराज लगे।
लेकिन पालपुर गांव के सरपंच श्याम बाबू कुशवाह कहते हैं कि हमने तीन जगह काम चालू करवाया है। लेकिन बैंक से देर से भुगतान मिलने के कारण लोग मनरेगा का काम नहीं करना चाहते हैं। इसकी पुष्टि पालपुर गांव के हरि भी करता है। हरि कहता है कि ऐसा काम करने का क्या फायदा जिसमें मजदूरी तीन महीने बाद मिले। केंद्रीय वन व पर्यावरण मंत्री ने खुद पहल करते हुए गुजरात सरकार से कह चुके हैं कि उन्हें मप्र को कुछ शेर भेज देना चाहिए। लेकिन गुजरात की अस्मिता का सवाल बनाते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने इससे साफ इनकार कर दिया है। जिसके बाद पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट चला गया है।
http://vichar.bhadas4media.com/society/1090-2011-03-07-06-23-56.html
http://visfot.com/home/index.php/permalink/3846.html

0 comments »
Post a Comment