जनाब अब बंद भी कीजिए ऐसे विज्ञापन

यदि आप खुद को पत्रकार मानते हैं तो यह आपके लिए ही है। यदि नहीं मानते हैं तो इसे मत पढ़िए। देश के किसी भी अंग्रेजी, हिंदी या रीजनल भाषा के अखबार उठाकर देख लीजिए, उसमें एक चीज आपको कॉमन मिलेगी। वे हैं भाम्रक और अश्लीलता से भरे विज्ञापन। हालांकि, देश में आज तक अश्लीलता को लेकर कोई भी परिभाषा नहीं बन पाई है। देश के सबसे बड़े अखबार को देख लीजिए या फिर मध्य प्रदेश में तेजी से बढ़ते अखबार को, या फिर उत्तर प्रदेश की धड़कन कहने वाले किसी अखबार को। वहां आपको ऐसे विज्ञापनों की बाढ़ दिख जाएगी। इन विज्ञापनों के लिए अपने देश में कोई आचार संहिता नाम की चीज नहीं है। एक और पत्रकारिता का दंभ होता है अखबारों में तो दूसरी ओर ऐसे विज्ञापन। इसमें आपको तेल, लोशन, क्रीम से लेकर चटपटी बातों तक के विज्ञापन शामिल हैं। विज्ञापनदाता ऐसे विज्ञापनों को बल्क में बुक कराता है। जिसका असर यह होता है कि किसी भी अखबार के जितने भी संस्करण है, सभी ये विज्ञापन आपको झांकते हुए दिख जाएंगे। कई बार तो लगता है कि आखिर अखबार वाले पैसे कमाने के लिए क्या किसी भी हद तक गिर सकते हैं तो जवाब मिलता है.हां भाई हां। वैसे भी आखिर आज अखबार को मतलब बदल गया है। अखबार अब पूंजी का गढ़ बन गया है। विदेशों में ऐसे विज्ञापनों के लिए बकायदा एक आचार संहिता बनी हुई है। ऐसे विज्ञापन पूरे अखबार में नहीं बल्कि एडल्ट नाम के एक कॉलम में छपते हैं। यहां साफतौर पर लिखा रहता है कि ये विज्ञापन प्रेस काउंसिल के नियमों के अनुसार ही छापे गए हैं। इन विज्ञापन का अखबार से कोई लेना-देना नहीं है। पाठक अपने रिस्क पर ही इन विज्ञापनों पर भरोसा करें। लेकिन अफसोस कि हमारे यहां जिस संस्था को ये जिम्मेदारी दी गई है, वे पंगुओं की तरह काम कर रही है। संस्था में कई दिग्गज पत्रकार हैं लेकिन किसी भी हिम्मत नहीं होती है कि वे खुलकर ऐसे विज्ञापनों के खिलाफ आवाज उठाएं। कहीं ऐसा तो नहीं, इससे उनकी दुकान पर कोई प्रभाव पड़ता हो। मुझे नहीं मालूम। यदि आपको मालूम है तो आप जरूर बताएं। क्या आपको ऐसे विज्ञापन देखकर तकलीफ नहीं होती है?

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