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हुसैन की तरह आपकी भी बहन-बेटी है जनाब

Thursday 18 March 2010 Leave a Comment

आप मानसिक रुप से कितने दिवालिए हो सकते हैं, यह इन तस्वीरों को देखकर आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। इन तस्वीरों को हमारे एक ब्लॉगर साथी ने हमें ईमेल से भेजी। इन्हें देखकर पहले तो काफी गुस्सा आया लेकिन फिर बाद में उस शख्स पर दया आई, जिसने इन तस्वीरों के नीचे फोटो कैप्शन लिखने में मेहनत की। इन तस्वीरों को आप खुद ही देखें और फोटा कैप्शन पढ़कर खुद तय करें कि क्या यह भाषा सही है। आज आप हुसैन के लिए ये बाते लिख रहे हैं, कल आपकी बहन-बेटी को भी यहां घसीटा जा सकता है। तय आप खुद करें..




14 comments »

  • Baat Pe Baat said:  

    Apane Bulkul Sahi Likha Hai Ki Yeisa Apake Bhi Sath Ho Sakta Hai. Lelin Jis Kisi Ne Art Pe Is Tarah ka Photo Cation Likhana Kafi Ghatiya Hai.

    18 March 2010 2:25 PM
  • Amitraghat said:  

    "सबका अपना-अपना नज़रिया है हुसैन साहब का कुछ और था और इन साहब का कुछ और......."
    amitraghat.blogspot.com

    18 March 2010 2:53 PM
  • संजय बेंगाणी said:  

    सीता, दूर्गा, सरस्वती हो तो गुस्सा नहीं आता. वह कला होती है. हुसैन की माँ बेटी हो तो अश्लीलता हो जाती है? किसी की माँ बेटी को घसीटना गलत है तो किसी के आराध्य को घसीटना क्या है?

    18 March 2010 3:00 PM
  • संजय बेंगाणी said:  

    हुसैन की माँ बेटी, ससम्मान हमारी भी माँ बेटी है जनाब.
    अब हुसैन से पूछे हमारी देवियाँ उसके लिए क्या है?

    ***


    किसी को मेरी टिप्पणी से गलत फहमी हो सकती है अतः बता दूँ, उक्त मेल मैने नहीं किया है. जिसने भी किया है, तथाकथित सेक्युलरों को नंगा कर दिया है.

    18 March 2010 3:04 PM
  • Dilnawaz Pasha said:  

    आशीष जी मैंने इन तस्वीरों को देखा और इन पर की गई टिप्पणी को भी पढ़ा। साफ है जिसने भी लिखा है गुस्सें में लिखा है और गुस्सें में इंसान विवेकहीन हो जाता है। तो अब ऐसी स्थिति में लिखी गई बात का क्या बुरा मानना।

    वैसे लिखने वाले नें हुसैन द्वारा बनाई गई पूजनीय देवी देवताओं की तस्वीरों पर ही तो कमेंट किया है। अगर हुसैन को अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में किसी देवी देवता की विवादस्पद तस्वीर बनाने का अधिकार है तो फिर उस व्यक्ति के पास भी अपना गुस्सा जाहिर करने का अधिकार है।

    और शायद हुसैन के लिए कलाकार के रूप मैं अपनी पैंटिग्स के लिए मां या बहन से कम सम्मान नही होगा।

    18 March 2010 3:08 PM
  • Raviratlami said:  

    इन्हें पारंपरिक भारतीय चित्रकला / मूर्तिकला के प्रतिमानों के उद्धरण देखना चाहिए. यूँ तो हजारों हैं, फिर भी, एक उदाहरण देता हूं -

    http://www.hauserwirth.com/artists/11/subodh-gupta/images-clips/1/

    इसी का डिटेल :

    http://www.hauserwirth.com/artists/11/subodh-gupta/images-clips/2/

    18 March 2010 3:58 PM
  • Anonymous said:  

    jisne bhi likha hai sahi likha hai... wo banaye to kuch nahin humne caption laga diya to hungama....?

    18 March 2010 4:17 PM
  • संजय बेंगाणी said:  

    श्री रविरतलामीजी,


    इन्हें पारंपरिक भारतीय चित्रकला / मूर्तिकला के बारे में ज्ञान भी और सम्मान भी है. मगर इसका मतलब यह नहीं कोई अपनी विकृति हमारे प्रतिकों पर प्रदर्शित करे. कला की एक शैली होती है. जिसमें सब समान होते है. अगर गंगा के खुले वक्ष है तो यमुना के भी होंगे, सीता के भी होंगे. मगर यह नहीं कि पण्डित नंगा, मुल्ला कपड़ों में. आशा है आपने हुसैन के चित्र देखें होंगे.

    18 March 2010 5:21 PM
  • संजय बेंगाणी said:  

    इन्हें पारंपरिक भारतीय चित्रकला = हमें पारंपरिक भारतीय चित्रकला

    18 March 2010 5:21 PM
  • Anonymous said:  

    hari sharma -
    मुझे ये समझ नही आया कि पोस्ट लेखक क्यू परेशान है. भाई ये कला है और कला के पुजारी की अनुपम रचनाये है. जिस भावना से चित्रकार ने इन्हे बनाया है उसी भाव से किसी ने नाम बदल दिये.
    अमा नाम मै क्या रखा है. कला तो कला है

    18 March 2010 5:51 PM
  • राहुल प्रताप सिंह राठौड़ said:  

    जिस किसी ने भी लिखा है ...एकदम सही लिखा है |"हुसेन" जैसे व्यक्ति ऐसे ही व्यवहार के हकदार है |

    19 March 2010 5:07 AM
  • Suresh Chiplunkar said:  

    यह "चेन मेल" खूब चल रहा है, और जिसने भी इसे पहली बार बनाया होगा, वह बेंगाणी जी के अनुसार सेकुलरों को नंगा करने के लिये ही बनाया होगा और वह व्यक्ति सफ़ल हुआ है…।

    ग्राफ़िक, लोगोस, डिज़ाइन, अखबारी "कार्टून"[:)] इत्यादि को कला नहीं माना जाता, सिर्फ़ हुसैन ही कला(?) के ठेकेदार हैं… (यानी "सेकुलर" कला ही कला है, बाकी सब कचरा है) यह सोच बदलना ही मुख्य ध्येय होना चाहिये। यह चेन-मेल जिसे भी मिले, आगे फ़ारवर्ड करें, ताकि सेकुलरों का दोमुंहापन उजागर हो सके… और कैप्शन लिखने वाले कलाकार (जी हाँ कलाकार) को भी बधाई…

    19 March 2010 11:23 AM
  • Anonymous said:  

    हुसैन का छोडो़ तुम्हारा तो माँ बहन है अगर हुसैन तुम्हारा माँ बहन का नँगा, काम वासना में लिप्त, मैथुन क्रिया में घोडा़ के साथ लिप्त चित्र बनाता जिस तरह से हिन्दु देवी भारत माँ का चित्र बनाया तव तुम क्या कहते।

    19 March 2010 11:48 AM
  • Anonymous said:  

    भारत माता की नग्न पेंटिंग में कला ढूंढ़ने वालों का हुसैन की माता की पेंटिंग पर इतना दर्द. हम इस देश को मातृभूमी कहते हैं. इसका मतलब समझते हो? और हम यह भी कहते हैं:

    जननी, जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी

    इसका मतलब है मां और मातृभूमि स्वर्ग से भी बड़ी होती हैं. हुसैन कि मां अगर जीवित होतीं तो ऐसे नालायक बेटा पैदा करन पर खुद को निश्चित ही शर्मसार महसूस कर रही होतीं जिसने अपनी मां से भी बड़ी भारत मां की इज्जत नहीं की.

    जहां तक सुबोध गुप्ता का सवाल है वो कोई पारंपरिक कलाकार नहीं है, वो एक मोर्डनिस्ट कलाकार है. शायद उसे भी कला की वही समझ है जो हुसैन को है. हुसैन का विरोध करने वालों ने अगर उसका समर्थन किया हो तो बताओ?

    हिन्दू होना कोई नग्न तस्वीरें या मूर्तियां बनाने की खुली छूट नहीं देता. यकीनन हम उसकी मूर्तियां अपने घरों के मंदिर स्थलों में नहीं लगायेंगे.

    तुम्हारी चेष्टा अगर अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा, या कला की रक्षा कि है तो उसमें बैलेंस क्यों नहीं दिखता? क्या किसी चैनल में नौकरी के लिये इंटरव्यु दिया है?

    शुभकामनायें. तुम्हें जरूर मिलेगी किसी सरकार-प्रिय चैनल में नौकरी. मुहुम चालू रखो. ब्लाग से निगाहों में तो चढ़ ही रहे हो.

    19 March 2010 12:44 PM
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    एकला चलो रे की तर्ज पर चला जा रहा हूं। जिंदगी में कई दोस्त आए और लगातार आए ही जा रहे हैं। दोस्ती और दुश्मनों, सफलता और असफलता की परिभाषाओं से ऊपर उठ चुका हूं। आस्तिक हूं, यह बात बस पता है। भोले की नगरी में पैदाइश है, साथ में मन बड़ा चंचल तो गले में रूदाक्ष की माला पहनता हूं। सुना है कि इससे मन शांत रहता हूं। खुद को सभ्य समाज में व्यवस्थित करने का प्रयास करते हुए खुद के काम कर रहा हूं। राम, कृष्णा के प्रदेश यानि उत्तर प्रदेश के वाराणसी में जन्म। भोले की नगरी में बचपन बिता। घाट-घाट का पानी पीया। बचपन बनारस और आजमगढ़ में बीता। स्कूली ज्ञान भी इन्हीं दोनों शहरों से प्राप्त किया। बाद में राजस्थान के अलवर और जयपुर का रूख किया। कॉलेज की मस्ती तो नहीं, हां पढ़ाई यहां की। फिर जिंदगी के सफर में भोपाल के लिए रुख किया। यूनिवसिर्टी में पढ़ाई कम मस्ती अधिक की। जब भी अवसाद से घिरता हुआ तो कहानी, कविता और ब्लॉग लिखने बैठ जाता हूं। यकीन मानिए मेरी जिंदगी ही एक कविता है। जितना गुनगुनाएंगे, उतना ही समझते जाएंगे मुझे।
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