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जरूरत है पत्रकारों की

Wednesday 31 December 2008 2 comments

मंदी के इस माहौल में पत्रकारों के लिए एक अच्छी उम्मीद जगी है। दिल्ली का एक बड़ा मीडिया समूह नए साल पर नई उम्मीदों के साथ एक पत्रिका लांच करने की तैयारी कर रहा है। जिसके लिए इन्हें १क्-१२ लोगों की आवश्यकता है। पत्रिका राजनीति और समसमायिक विषयों पर होगी। इच्छुक पत्रकार को हिंदी व अंग्रेजी टायपिंग के साथ अंग्रेजी पर भी कमांड होनी चाहिए। नौकरी के लिए इच्छुक पत्रकार वीआई आलोक से 9810156740 पर संपर्क किया जा सकता है। Read the full story

कैसे न्याय मिलेगा जयश्री को

Saturday 27 December 2008 15 comments

आप जिस मासूम लड़की की फोटो देख रहे हैं, वह अब इस दुनिया में नहीं रही। २५ दिसंबर की जब पूरी दुनिया क्रिसमस के रंग में रंगी हुई थी तो उसी रात इंदौर में इसकी हत्या कर दी गई है। यह जयश्री है। इंदौर की रहने वाली जयश्री की गलती जानना चाहेगें आप? गलती यह थी कि वह अपने अधिकार के लिए लड़ना जानती थी। थाने स्तर से लेकर एसपी तक वह पहुंची थी न्याय की आस में। लेकिन उसे न्याय नहीं मिला। न्याय के बदले मौत मिली। मौत भी ऐसी जिसे देखकर दरिंदे भी कांप जाएं। कभी कभी लगता है हम जिस सभ्य समाज की बात करते हैं, वह वास्तव में यह ही नहीं। यदि समाज सभ्य होता तो जयश्री को न्याय दिलवाने के लिए समाज से एक आवाज उठती, जो कि नहीं उठ रही है। हमारा समाज निकम्मों का समाज तो नहीं हो गया है?

जयश्री के पिता देश की सेवा के लिए सीमा पर गए हुए थे। परिवार को शहर में समाज के भरोसे छोड़कर गए थे। लेकिन उन्होंने इस बात का इल्म नहीं था कि जिस समाज पर वे इतना भरोसा करते थे, उसी समाज में उनकी लाडली की हत्या हो जाएगी। इंदौर की १३ साल की जयश्री शहर के एक ब्यूटी पार्लर में अपनी आईब्रो सेट कराने गई थी। जहां वहां की संचालिका ने पार्लर में बैठे लड़कों से बात करने और मिलने को कहा। जब जयश्री ने ऐसा करने से लिए मना किया तो पहले संचालिका ने उसे इस पूरी घटना के बारे में घर के किसी भी सदस्य को न बताने के लिए मना किया। लेकिन जैसे ही जयश्री वहां से निकलने लगी तो ब्यूटी पार्लर में बैठे दो लड़के उसके साथ जबरदस्ती
करने लगे। वह किसी तरह अपनी अस्मत बचा कर वहां से भाग गई। जयश्री ने जब पूरी घटना अपनी मां पद्मश्री को सुनाई तो मां उसे साथ लेकर शहर के मल्हार गंज थाने पहुंचीं। जहां उस वक्त ड्यूटी पर मौजूद एसआई मण्लोई रिपोर्ट लिखने के बजाए उल्टा गाली गलौच करने लगे।

पद्मश्री जब एसपी से इस बात की शिकायत एसपी संजीव शमी को भी की थी। शिकायत के कुछ दिनों बाद जब इंदौर के एक अखबार में पूरा किस्सा छपा तो देर रात जयश्री की हत्या हो चुकी थी। एक जागरुक नागरिक होने के नाते क्या हम और आप जयश्री के लिए कुछ कर सकते हैं? यह अब हमें ही तय करना है। यदि आपके पास जयश्री को न्याय दिलाने के लिए कोई सुझाव हैं तो आप मुझे जरुर बताएं। Read the full story

ये हैं निर्मला देवी

Thursday 25 December 2008 11 comments

अपने आपको भगवान मानने वालीं माता निर्मला देवी की यह फोटो इन दिनों ई मेल के माध्यम से पूरी दुनिया में फैल रही हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि उनके पति आईएएस आफिसर हुआ करते थे, जो कि उनके बगल में ही बैठे हुए हैं। अब आप ही अंदाजा लगा लिजिए कि हमारे संत और आईएएस आफिसर हमारे देश और राष्ट्रीय ध्वज की कितनी इज्ज्त करते हैं। यह अब हमें और आपको तय करना है कि इनके खिलाफ क्या कार्रवाई की जाए। इनकी सच्चई समाज के सामने लाएं या फिर चुप्पी तान कर इस ठंड के मौसम में रजाई के अंदर घुस जाएं। तय आपको करना है।
जय हिंद Read the full story

बॉस यू आर ग्रेट

Tuesday 23 December 2008 8 comments

यदि मैं आपसे कहूं कि गणपति बप्पा दुनिया के सबसे पहले मैनेजमेंट गुरु थे तो आप शायद यकीन न करें। लेकिन जनाब यह सच है। लोग तो यहां तक कहते हैं कि गणोश जी दुनिया के सबसे पुराने चापलूस थे। कैसे। मैं इन्हें चापलूस तो हां दुनिया का सबसे पहला मैनेजमेंट गुरु कहूंगा। कैसे। चलिए मैं आपको बताता हूं। यदि आप मीडिया से जुड़े हुए हैं तो गणोश जी आपके लिए एकदम सही उदाहरण हैं सफलता के लिए। आप सभी ने एक कहानी सुनी होगी कि एक बार गणोश जी और कार्तिकेय में यह होड़ मच गई कि उनमें से कौन बड़ा है। मामला ऊपर तक गया हो तो यह तय किया गया कि जो सबसे पहले पूरे जगत का सात चक्कर लगाकर मां पार्वती और पिता भोलेनाथ के पास आएगा, उसी को पूरी दुनिया पूजेगी। बस फिर क्या था, कार्तिकेय जी निकल गए पूरे जगत का चक्कर लगाने के लिए। इस मामले में गणोश जी थोड़े होशियार निकले। उन्होंने भोलेनाथ और मां पार्वती के ही सात चक्कर लगा लिए। अंत में गणोश जी को ही महान मान लिया गया। अब आप सोच रहे होंगे कि इस कहानी में मैनेजमेंट फंडा कहां है तो चलिए मैं बता देता हूं। सबसे पहले गणोश जी को अपना आदर्श मानकर अपने बॉस को अपना आदर्श माने या न माने लेकिन शो ऐसे ही करें। संकट के समय आपके बॉस ही आपके काम आएंगे। गणोश जी से थोड़ा और कुछ सीख लेते हैं। सबसे पहले गणोश जी की सूंड को देखें। इस सूंड से यह सीखा जा सकता है कि आपकी नाक इतनी लंबी होनी चाहिए कि कहीं भी जाकर अंदर की खबर सूंघ सके। ऐसे ही बड़े कान से यह सीखने को मिलता है कि ऑफिस में क्या क्या बातें चल रही हैं या फैल रही हैं उसकी जानकारी आपको होनी चाहिए। ऐसे ही गणोश जी का बड़ा पेट हमें सीखाता है कि जितनी भी बात आप सुनते हैं, उसे अपने तक ही रखें। गणोश जी का मुंह अंदर की ओर है यानि बात को सुने ज्यादा बोले कम। यदि आप सफल होना चाहते हैं तो अपना काम पूरी ईमानदारी से करें ही लेकिन साथ में व्यवहार कुशल भी बनें। सबसे संबंध बना कर रखें। पता नहीं कौन कब आपकी सफलता में टांग अड़ा दे।

जय जय Read the full story

प्लेब्वाय ने कहा गुड बाय

Monday 15 December 2008 5 comments

यदि आप सोचते हैं कि केवल भारतीय मीडिया में ही कटौती का भूत डरा रहा है तो एक बार फिर से सोच लें। वयस्क मनोरंजन पत्रिका प्रकाशक प्लेब्वाय इंटरप्राइजेज ने लागत में बचत के लिए कर्मचारियों की संख्या 14 प्रतिशत घटा दी है। कंपनी ने अपना वितरण बढ़ाने के लिए भारत को प्रमुख लक्षित क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया है। न्यूयार्क स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध यह कंपनी भारत के साथ-साथ चीन एवं लातिन अमेरिका पर भी ध्यान दे रही है। निवेशक सूचना में कंपनी ने कहा कि लागत घटाने के लिए उसने 14 प्रतिशत कर्मचारियों को हटा दिया है। उसने कई तरह के भत्तों आदि में भी कटौती की Read the full story

मीडिया », संपादक »

संपादक नहीं मैनेजर चाहिए

10 comments

यहां जो भी लिखा हुआ है, हो सकता है उसे पढ़कर संपादक नाम का प्राणी निराश या फिर नाराज हो सकता है। लेकिन न जाने फिर भी क्यों लिखना पड़ रहा है। कहते हैं ना जो मन में आए, उसे कहीं न कहीं उतार देना चाहिए। कुछ समय पहले तक लगता था कि किसी अखबार में संपादक बहुत बड़ी ताकत होती है। यह मेरा भम्र था। जो अब धीरे धीरे दूर होता जा रहा है। लेकिन जिस उम्र के पड़ाव पर मैं या मेरे जैसे लोग खड़े हैं, उनके लिए इस भम्र का टूटकर बिखरना किसी ख्वाब से टूटने से कम नहीं है।

पत्रकारिता में आने का एक ही मकसद था और है भी। कुछ करना है। सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि इस देश और समाज के लिए भी। लेकिन कई बार लगता है कि यहां तो स्थिति अन्य फील्ड से भी बद्तर है। हम अपनी ही दुनिया में जीते हैं और पत्रकार होने का भम्र पालते हैं। संपादक को सबसे प्रमुख मानते हैं। लेकिन तकलीफ तब होती है जब पता चलता है कि संपादक के ऊपर भी कोई है। जिसके बिना अखबार में एक पत्ता भी नहीं हिलता है।

जिस रफ्तार से संपादक जैसी संस्था कमजोर हो रही है, उसी रफ्तार से ख्वाब भी बिºर रहे हैं। एक वरिष्ठ संपादक की वो बात बार बार याद आती है जब उन्होंने मुझसे एक बार कहा था कि आशीष जिस जगह आप खड़े हो, वहां से अखबार का गेट बहुत बड़ा दिखता है। लेकिन अब आप मेरी जगह आओगे तो यही गेट बहुत छोटा हो जाएगा। यह बात उस वक्त मुझे समझ में नहीं आई। लेकिन आज समझ सकता है। देश में कितने संपादक हैं जिन्हें हम देश का सबसे अच्छा संपादक कह सकते हैं। यदि आप ऐसे संपादकों को जानते हैं तो मुझे जरूर बताइएगा। स्थिति विकट है। Read the full story

मीडिया »

मंदी बनाम मीडिया

Sunday 14 December 2008 1 comments

मीडिया में इन दिनों मंदी का माहौल चल रहा है। इसमें नया कुछ भी नहीं है। लेकिन कई ऐसी मीडिया कंपनी भी हैं जो इन मंदी का भरपूर मजा उठा रही हैं। मंदी के बहाने जहां इन्हें लागत कम करने का बहाना मिल गया, वहीं सीमा से अधिक कर्मचारियों को भगाने का मौका भी मिल गया है। सबसे अधिक वे कंपनियां अपने आप को प्रभावित बता रही हैं जिनकी पूंजी अन्य कारोबार में फैली हुई है। मुंबई से लेकर दिल्ली तक, हर तरफ मंदी का डर फैलाकर उन्हें ही डराया जा रहा है जो समाज के लिए लड़ने की बात करते हैं। जी हां मैं पत्रकारों की बात कर रहा हूं। इनदिनों अधिकांश पत्रकार अपनी नौकरी को बचाने के लिए जी जान से जुटा पड़ा है। सबसे अधिक परेशान वे पत्रकार हैं जो अधिक वेतन पर अब तक मजे ले रहे थे। स्थिति बुरी है। गुस्सा पत्नी और बच्चों पर निकरल रहा है। जनाब पेजमेकर से लेकर संपादक तक की सांसे थमी हुई है। हालांकि कमी ही लोग हैं जो खुलकर कुछ भी बोल रहे हों। अधिकांश की स्थिति ऐसी है जो सड़क पर दूसरों के हकों की बात कर रहे हैं लेकिन दफ्तर के अंदर दुम दबाकर बैठे हुए हैं। इस मंदी के दौर में एक बात तो साफ हो गई है कि मीडिया खासतौर पर मीडिया से जुड़ी कंपनियां किसी की नहीं होती हैं। इसलिए बार बार कहता हूं और पूरा विश्वास है कि आप अपने आपसे और अपने काम से प्यार किजीए ना कि किसी एक कंपनी से। यदि आपका काम बेहतर होगा तो कंपनियां झक मारकर आपको लेंगी। यही सच है। समय बुरा है, इंतजार किजीए समय बदलने का। Read the full story

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बाघों की दुनिया

बाघों की दुनिया
बाघों की दुनिया की सच्चाई से यदि आप होना चाहते हैं रूबरू तो यहां आपका स्वागत है। दुनिया के सबसे खूबसूरत जानवर का अस्तिव खतरे में है। आइए हम सब मिलकर इसे बचाएं।

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Ashish Maharishi

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आशीष महर्षि
Delhi, Delhi, India
एकला चलो रे की तर्ज पर चला जा रहा हूं। जिंदगी में कई दोस्त आए और लगातार आए ही जा रहे हैं। दोस्ती और दुश्मनों, सफलता और असफलता की परिभाषाओं से ऊपर उठ चुका हूं। आस्तिक हूं, यह बात बस पता है। भोले की नगरी में पैदाइश है, साथ में मन बड़ा चंचल तो गले में रूदाक्ष की माला पहनता हूं। सुना है कि इससे मन शांत रहता हूं। खुद को सभ्य समाज में व्यवस्थित करने का प्रयास करते हुए खुद के काम कर रहा हूं। राम, कृष्णा के प्रदेश यानि उत्तर प्रदेश के वाराणसी में जन्म। भोले की नगरी में बचपन बिता। घाट-घाट का पानी पीया। बचपन बनारस और आजमगढ़ में बीता। स्कूली ज्ञान भी इन्हीं दोनों शहरों से प्राप्त किया। बाद में राजस्थान के अलवर और जयपुर का रूख किया। कॉलेज की मस्ती तो नहीं, हां पढ़ाई यहां की। फिर जिंदगी के सफर में भोपाल के लिए रुख किया। यूनिवसिर्टी में पढ़ाई कम मस्ती अधिक की। जब भी अवसाद से घिरता हुआ तो कहानी, कविता और ब्लॉग लिखने बैठ जाता हूं। यकीन मानिए मेरी जिंदगी ही एक कविता है। जितना गुनगुनाएंगे, उतना ही समझते जाएंगे मुझे।
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