यहां जो भी लिखा हुआ है, हो सकता है उसे पढ़कर संपादक नाम का प्राणी निराश या फिर नाराज हो सकता है। लेकिन न जाने फिर भी क्यों लिखना पड़ रहा है। कहते हैं ना जो मन में आए, उसे कहीं न कहीं उतार देना चाहिए। कुछ समय पहले तक लगता था कि किसी अखबार में संपादक बहुत बड़ी ताकत होती है। यह मेरा भम्र था। जो अब धीरे धीरे दूर होता जा रहा है। लेकिन जिस उम्र के पड़ाव पर मैं या मेरे जैसे लोग खड़े हैं, उनके लिए इस भम्र का टूटकर बिखरना किसी ख्वाब से टूटने से कम नहीं है।
पत्रकारिता में आने का एक ही मकसद था और है भी। कुछ करना है। सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि इस देश और समाज के लिए भी। लेकिन कई बार लगता है कि यहां तो स्थिति अन्य फील्ड से भी बद्तर है। हम अपनी ही दुनिया में जीते हैं और पत्रकार होने का भम्र पालते हैं। संपादक को सबसे प्रमुख मानते हैं। लेकिन तकलीफ तब होती है जब पता चलता है कि संपादक के ऊपर भी कोई है। जिसके बिना अखबार में एक पत्ता भी नहीं हिलता है।
जिस रफ्तार से संपादक जैसी संस्था कमजोर हो रही है, उसी रफ्तार से ख्वाब भी बिºर रहे हैं। एक वरिष्ठ संपादक की वो बात बार बार याद आती है जब उन्होंने मुझसे एक बार कहा था कि आशीष जिस जगह आप खड़े हो, वहां से अखबार का गेट बहुत बड़ा दिखता है। लेकिन अब आप मेरी जगह आओगे तो यही गेट बहुत छोटा हो जाएगा। यह बात उस वक्त मुझे समझ में नहीं आई। लेकिन आज समझ सकता है। देश में कितने संपादक हैं जिन्हें हम देश का सबसे अच्छा संपादक कह सकते हैं। यदि आप ऐसे संपादकों को जानते हैं तो मुझे जरूर बताइएगा। स्थिति विकट है।
Read the full story
Blogging Barracks