सप्ताह के ब्लॉगर में इस बार हम लेकर आएं हैं मध्य प्रदेश के शहर रतलाम के निवासी रवि रतलामी को। रवि रतलामी एक ऐसे शख्स हैं जिन्हें हिंदी के सभी ब्लॉगर जानते हैं। तकरीबन 20 साल तक सरकारी बिजली कंपनी में इंजीनियर के रुप में कार्य करने के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृति लेकर अब वे मुक्त तकनीकी लेखक और तकनीकी अनुवादक के रुप में कार्य कर रहे हैं। माइक्रोसॉफ्ट भाषा इंडिया ने वर्ष 2006 में उनके ब्लॉग रवि रतलामी को बेस्ट हिंदी ब्लॉग्ा अवॉर्ड से नवाजा। वर्ष 2007 में माइक्रोसॉफ्ट ने रवि रतलामी को मोस्ट वेल्यूएबल प्रोफेशनल और अगस्त 2007 में अभिव्यक्ति ने टेक्नालॉजी राइटर अवॉर्ड से सम्मानित किया। रवि रतलामी से विभिन्न मुद्दों पर बोल हल्ला के लिए कमल शर्मा ने बातचीत की। पेश है बातचीत के मुख्य अंश :
हिंदी ब्लॉगिंग में अभी तक अजेय लेखन नहीं दिख रहा। अधिकांश हल्का फुल्का या चंदमिनटों में मिट जाने वाला लिख रहे हैं। आप का क्या कहना है ?
हिंदी ब्लॉगिंग अभी तो शुरू ही हुई है, और इससे जरूरत से कहीं ज्यादा अपेक्षाएं की जा रहीहैं। अजेय लेखन भी आएगा और ऐसे लेखन भी आएंगे जिनके उद्धरण अंग्रेज़ी और अन्य भाषाओं में दिए जाएंगे. पर, ये बात भी सच है कि हिन्दी में फ़्रेडरिक फ़ोरसाइथ(http://en.wikipedia.org/wiki/Frederick_Forsyth) के द ओडेसा फ़ाइल(http://en.wikipedia.org/wiki/The_Odessa_File) या द अफ़गान(http://en.wikipedia.org/wiki/The_Afghan) जैसा शोधपूर्ण लेखन देखने में कम ही आयाहै. शायद भविष्य का हिन्दी ब्लॉग लेखन इस खाई को भी भर दे ?
सफल ब्लॉग और ब्लॉगर बनने के लिए किन बातों पर ध्यान देना चाहिए। कंटेंट और तकनीकी दोनों दृष्टियों को ध्यान में रखते हुए एक ब्लॉगर को क्या करना चाहिए ?
सफलता तो अभी मुझसे भी कोसों दूर है। दिल्ली दूर है। बहुत दूर। सैकड़ों प्रकाशवर्ष दूर। मेरे ब्लॉग के नियमित सब्सक्राइबर दस हजार हों, महीने के कम से कम एक लाख पाठक हों तो मैं मानूंगा कि मैं सफल हूं। ऐस में मैं किस मुंह से सफल ब्लॉग और ब्लॉगर बनने के गुर दे सकता हूँ भला! लेकिन जब आपने पूछ ही लिया है और कोई नुकसान नहीं हो रहा तो कुछ बातें बताता हूं। सफलता के कई पैमाने हैं। एकदम शुरू में, जब मैंने अपने ब्लॉग की शुरूआत की थी तो लक्ष्य था अपनी इधर उधर बिखरी रचनाओं को इंटरनेट पर डालना ताकि लोग जब मर्जी बन पड़े, पढ़ें। वो सबके लिए, सर्वसुलभ रहे। इस मामले में मैं सफल रहा हूं। तो आपकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आपका लक्ष्य क्या है। यदि कोई अपने ब्लॉग में निजी, पारिवारिक बातों को लिखता है और वो पारिवारिक सदस्यों, अपने मित्रों के लिए लिखता है और यदि यही उस ब्लॉग का लक्ष्य है तो वो सफल हुआ ना ? मेरे विचार में हर ब्लॉग और हर ब्लॉगर अपने तईं सफल है। लेकिन यह बात भी है कि समयानुसार लक्ष्य बदलते रहते है।
कंटेंट और तकनीकी के लिहाज से बात करें तो ब्लॉग के मामले में ये कहावत सही है- कंटेंट इज़ द किंग। तकनीकी तो आपकी भाषा, आपकी शैली, आपके विषय, आपके प्रस्तुतिकरण से लेकर और भी बहुत कुछ हो सकता है। ये चीजें अभी उतनी मायने नहीं रखती हैं जबकि मात्र तीन हजार ब्लॉग हैं और कोई सौ-दो-सौ पोस्टें ले-देकर रोज आ रही हैं। जब हिंदी ब्लॉगों की संख्या एक लाख को पार करेगी, दैनिक पोस्टों की संख्या दस हजार को पार करेगी, तो हर एक के सफलता के पैमाने बदलेंगे और तब सामग्री से समृद्ध, सारगर्भित चिट्ठों की ही पूछ परख रहेगी।
आप तकनीकी अनुवाद के कार्य से भी जुड़े हुए हैं लेकिन हिंदी में जो तकनीकी अनुवाद हो रहे हैं वे काफी कठिन है। बोलचाल की हिंदी में नहीं है। आपका क्या कहना है ?
अनुवाद का काम बहुत ही जोख़िम भरा होता है. मूल लेखक दिल्ली की बात कहता है और उसके अनुवाद में मुंबई के बारे में बातें हो जाने के पूरे खतरे रहते हैं। तकनीकी अनुवाद में और भी समस्या रहती है। एक ही परियोजना में तमाम क्षेत्र के लोग एक साथ काम करते हैं। हर एक का अपना भाषाई नज़रिया होता है। लिनक्स हिंदी में तकनीकी अनुवाद को बढ़िया बनाने हेतु अब तक कोई चार कार्यशालाएं आयोजित की जा चुकी हैं जिनमें भाषाविदों से लेकर तकनीकी विशेषज्ञों यानी सभी क्षेत्रों के लोग शामिल रहे हैं। एक एक शब्द के लिए बुल/डॉग फाइटिंग तक की नौबत आई है कि अंग्रेज़ी के किसी खास शब्द के लिए ये वाला हिंदी शब्द क्यों और ये वाला क्यों नहीं। आम प्रयोक्ता को खुश करने के लिए आसान हिंदी करें तो परिशुद्धतावादी आंखें तरेरते हैं। परिशुद्धतावादियों को खुश करने की कोशिश में आम उपयोक्ता कन्नी काटने लगता है। तो एक तरह से तलवार की धार पर चलना है तकनीकी अनुवाद। यदि आप कंप्यूटरों पर उपलब्ध हिंदी की बात कर रहे हैं तो थोड़ा सा समय दीजिए। आगे चलकर अनुवाद शुद्ध, सही, सरल तो होंगे ही भविष्य में उपयोक्ताओं को भी कुछ स्तर पर कठिन शब्दों को आत्मसात करने की आदत पड़ेगी।
हिंदी ब्लॉग जगत में बीच बीच में विवाद मसलन नारद, मोहल्ला और भडास व मोहल्ला आदि चलता रहता है। आपका क्या कहना है कि इस तरह की छिटाकशी पर ?
इस साल के प्रारंभ में दिलीप मंडल ने हिंदी ब्लॉगिंग के लिए कुछ मन्नतें मांगी थी। उनमें एक था- हिंदी ब्लॉग जगत में भरपूर विवाद होने चाहिएं। इससे हिंदी ब्लॉग जगत का भला होगा। यह बात सही है, परंतु लोग व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप में गाली-गलौज युक्त भाषा प्रयोग करने लगते हैं तब निसंदेह वह गलत है। वाद विवाद होते रहेंगे, हर किस्म के होते रहेंगे।रचनात्मक किस्म के विवादों से हिंदी ब्लॉग जगत को नई दिशाएं भी मिलेंगी ये भी तयशुदा बात है।
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Saturday, 15 March, 2008
कंटेंट इज द किंग − रवि रतलामी
at 3:28 PM
Labels: कमल शर्मा, रवि रतलामी, सप्ताह का ब्लॉगर
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11 आपकी राय:
मैं हमेशा चाहता हूं कि रवि जी जैसा लिखूं।
कई बार तो पोस्ट लिख कर सोचता हूं कि शायद रवि जी भी ऐसा ही कुछ लिख चुके हैं।
उनका प्रभाव ऐसा है कि अपने चिट्ठे पर विज्ञापन लगाने के लिये भी देखता हूं कि रवि जी ने अपने चिट्ठे पर कैसे और कहां कहां विज्ञापन लगाये हैं।
सही मायने में आदर्श चिट्ठाकार हैं रवि जी।
रतलामी जी हम सबके आदर्श है। ब्लॉगिंग की दुनियां के भीष्म पितामह हैं।
उनसे रूबरू कराने के लिए शुक्रिया
जगदीश जी काफी हद तक सहमत!!
रवि जी तो वाकई एक आदर्श हैं
रवि भाई ये बात अर्से से कहते आए है कि मुख्य बात content है और उससे मेरी सदा से सहमति रही है। इस इंटरव्यू के लिए आभार!
रवि जी से मुलाकात कराने का शुक्रिया!
Ravi ji mulakat karane ke liye bolhalla aur Kamal Sharma ji ka bahut bahut dhanyavad.
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बात तो रवि रतलामी जी सहिये कहते हैं लेकिन इस इंटरव्यू का कंटेन्ट बहुत संक्षिप्त है।
शुक्लजी के लिए अलग से भारी भरकम कंटेंट की व्यवस्था की जाय.... :)
कन्टेन्ट वाला ही टिकेगा.
बहुत आभार रवि भाई से इस कदर मिलवाने के लिये. :)
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