मीडिया धंधा है पर गंदा नहीं
कई दिनों से मीडिया के बदलते चरित्र पर लिखने का मन था। लेकिन समय के अभाव के कारण लिख नहीं पा रहा था। लेकिन आज लिख रहा हूं। बोल हल्ला पर पिछले कई दिनों से मीडियों पर लोगों ने अपने अपने तरीकों से अपनी अपनी बात रखी। लगभग सभी एक बात से तो सहमत थे कि मीडिया अब पहले जैसा नहीं रहा। इसमें कुछ बदलाव आएं हैं जो कि अधिकतर लोगों को नकारात्मक लगे। यह अच्छी बात है कि लोगों ने खुलकर अपनी बात रखी। लेकिन कुछ बात मैं भी कहना चाहूंगा। मुझे लगता है कि अब हमें मीडिया से यह अपेक्षा करना छोड़ देना चाहिए कि इसके माध्यम से हम पत्रकार कोई समाजिक क्रांति ला सकते हैं। कुछ लोग मेरी बातों से इत्तेफाक नहीं रखते होंगे। लेकिन ऐसा क्यों होता है कि जब किसी वेब पोर्टल पर या न्यूज चैनल पर निकोल किडमैन, मल्लिका शेरावत या राखी सावंत से संबंधित न्यूज आती है तो इसे देखने वाले दर्शक अचानक बढ़ जाते हैं। जबकि धूम्रपान को रोकने, विदर्भ में मर रहे किसानों से लेकर अन्य विकास की खबरों को दर्शक या पाठक नहीं मिल पाते हैं। इसके लिए कौन जिम्मेदार है। हम पत्रकार या वो लोग, जिनके हाथ में टीवी का रिमोट और अखबार हैं। यदि पाठक या दर्शक चाह लें तो मीडिया को झक मार कर अपने चरित्र में बदलाव करना होगा। लेकिन अफसोस है पाठकों की चुप्पी ने पूरे मीडिया को धंधे में बदल दिया है। इसके लिए हम लोग भी जिम्मेदार है। हम टीआरपी के नाम पर नाग नागिन से लेकर राज ठाकरे तक को इतना हाइप दे देते हैं कि पूरे देश में एक अजीब सा माहौल बन जाता है। लेकिन अब पाठकों व दर्शकों को ही कुछ करना होगा। क्योंकि लगाम उन्ही के हाथ में है।
इन दिनों देश भर में अंग्रेजी और हिंदी की खिचडी के संग अखबार निकल रहे हैं। जिनकी बिक्री भी कम नहीं है। मेरे जैसे लोग जनसत्ता और हिंदू को सबसे बेहतर समाचार पत्र मानते हैं। एनडीटीवी हमारे लिए बेस्ट न्यूज चैनल है। लेकिन ऐसा क्यों हैं कि इनके दर्शक या पाठक कम हैं। लोगों को यह अखबार या चैनल नहीं भाता है। जिसके कारण इन्हें सीमित पाठक वर्ग या दर्शक वर्ग के कारण नुकसान उठाना पड़ता है।
खैर मैं फिलहाल जिस मीडिया संस्थान में हूं, वहां मुझे इस बात का भ्रम नहीं है कि मैं पत्रकारिता कर रहा हूं। मुझे पता है कि पत्रकारिता कम से कम यहां संभव नहीं है। मैं यहां एक न्यूज क्लर्क की भूमिका में हूं। कुछ न्यूज बनाई और अपना काम खत्म। मुझे यह भी पता है कि इन न्यूज से कुछ खास होने वाला भी नहीं है। बस एक नौकरी है और हर रोज वही कर रहा हूं। लेकिन आज से दो साल पहले ऐसा नहीं था। भोपाल में पत्रकारिता की पाठशाला में जब मैं अपने दोस्तों के साथ पत्रकारिता का ककहरा सीख रहा था तो मन में कहीं न कहीं था कि कुछ ऐसा करना है कि जिससे समाज के अंतिम आदमी को अधिक से अधिक लाभ पहुंचे। भोपाल आने से पहले जयपुर में जब निखिल वागले के समाचार पत्र महानगर के लिए रिपोर्ट करता था तो उस समय यह बाते मन में नहीं थी। क्योंकि यह काम मैं कर रहा था। भोपाल से निकला और इसके बाद जब सच्चाई की जमीन पर नंगे पांव चला तो समझ में आया कि जनाब आप जिस पत्रकारिता की बात कर रहे हो यह तो यहां संभव ही नहीं है। अब तो मीडिया पूरी तरह धंधा बन चुका है। अपको अपनी नौकरी भी बजानी है और पत्रकारिता भी करना है तो कुछ बीच का रास्ता तलाशना होगा। यानि आप जल में रहकर मगर से बैर नहीं कर सकते हैं। ऐसे में मीडिया में घुसें और सबसे पहले अपना स्पेस बनाए। और ऐसा भी नहीं है कि यदि आप मेहनत से कोई रिपोर्ट लाते हैं जो कि कुछ खास हो तो वो प्रकाशित नहीं होगी। बशर्ते हमें यानि हमारे जैसे युवा पत्रकारों को थोड़ा अधिक मेहनती होना पड़ेगा। मेहनत के साथ दिमाग का भी सही उपयोग आना जरुरी है।
कभी कभी बड़ी निराशा हाथ लगती है जब इस पेशे में लोग आते हैं कुछ कर गुजरने का जज्बा लेकर, लेकिन जब इस पेशे का अंग बनते हैं तो सबसे पहले यही लोग इसे सरकारी नौकरी समझने लगते हैं। मेरे कुछ जानकार भी ऐसे ही लोगों की श्रेणी में आते हैं। इनके लिए पत्रकारिता एक नौकरी है। जहां आपको नाम, ग्लैमर्स और पैसा मिलता है। समाज सेवा, मिशन, क्रांति की बात करते समय ये लोग नाक भौं सिकुड़ने लगते हैं। ऐसे लोगों से मुझे या मीडिया में जो गंभीर रुप से जुड़े हुए है उन्हें कोई खास उम्मीद नहीं है। लेकिन ऐसे ही लोगों की वजह से यह पेशा बदनाम हो रहा है। लेकिन इन सबके बावजूद मैं बस इतना कहना चाहूंगा कि यदि आपमें कुछ खास है तो आपको मीडिया के इस धंधे में सफल होने से कोई नहीं रोक सकता है। क्योंकि खास बनने के लिए कुछ खास करना भी होता है।
आशीष महर्षि

अच्छा लिखा। मीडिया हाउस के कर्ता धर्ता जो चाहते हैं उसके अनुसार ही कार्य करना होता है। हालांकि, कई बार मन में यह बात उठती है कि हम जो चाहते थे वे नहीं कर पाए लेकिन उसके भी रास्ते हैं और अपनी तय की गई मंजिल की ओर बढ़ सकते हैं। अपनी वेबसाइट और ब्लॉग और कुछ तरह के प्रकाशन के माध्यम से आप वह कर सकते हैं जो करना चाहते हैं। जिसने दुनिया को बदलने या अपने विचार सामने रखने का फैसला कर लिया उसे कोई रोक नहीं सकता। आप निराश न होए और यह सोचें कि कैसे मैं वह कर सकता हूं जो चाहता हूं। तुलसी इस संसार में भांति भांति के लोग....बस वैसे ही हर मीडिया हाउस की नीति अलग अलग होती है लेकिन हमें रास्ते खुद ही खोजने होते हैं।
माफ करना आशीष, मैं दर्शकों के पैसिव होनेवाले मसलों पर बोलना चाहूंगा। यही बात आजतक के नकवी साहब ने हिन्दी अकादमी द्वारा आयोजित एक व्याख्यान में कहा था कि ऑडिएंस पैसिव हैं, उन्हें हमारा कार्यक्रम अच्छा नहीं लगता तो लिखकर भेजे। उस समय मैं उनसे इम्प्रेस हो गया. लेकिन जब मैं खुद आजतक में डेस्क पर इन्टर्न की हैसियत से वहां काम करता था तो देखता दर्शकों की पचासों चिट्ठियां आती है और उसकी कोई नोटिस नहीं लेता,कई बहुत ही तार्किक। इतना ही नहीं रोज कई फोन भी आते और समय के कारण लोग बात नहीं करते,मुझे पकड़ा देते और मैं समझो दिन ही काटता। कभी-कभी तो दर्शकों को मां-बहन तक कर दी जाती। इसलिए दर्शकों का एक्टिव होना काफी कुछ मीडिया के रवैसे पर है। क्या मीडिया वाकई इतना ही स्पेस देता है कि दर्शक अपनी बात कर सके। मेरे अपने ही मामले को देखो न, ब्लॉग पर मैंने जनसत्ता के विरोध में लिखा और पता नहीं कहां कहां उन्होंने फोन खड़का दिए कि ऐसे कैसे हो सकता है। कुल मिलाकर मीडिया ऑडिएंस के प्रजेंस को किस रुप में लेती है इस पर सोचना और बात करना बहुत जरुरी है।
चिंतन जारी रहना चाहिए. पांच साल पहले हमारी भी यही भाषा थी. फ्रीलांसर हो गये. और अब ब्लागरी कर रहे हैं.
चिंतन जारी रहना चाहिए. पांच साल पहले हमारी भी यही भाषा थी. फ्रीलांसर हो गये. और अब ब्लागरी कर रहे हैं.
अंदर के पत्रकार को जिंदा रखना है तो न्यूज क्लर्क से भी आगे सोचना होगा।
विनीत साहब की बातों से काफी हद तक सहमति है!
मीडिया अपने आप में कोई ऐसी चीज नही है जो सोच समझ सके यहा के लोग बदल गए हैं. मीडिया आज भी जस की तस है. संस्थान के लोग बदले हैं. संस्थान नही. लोगो की सोच बदलिए सब कुछ बदल जाएगा. डेस्क के लोग कहते हैं यह भी कोई काम है वो अपना काम ठीक से नही करते हैं, भाषा को कसना होगा टैब पता लगेगा की डेस्क का बन्दा क्या क्या कर सकता है.
बिलकुल सही है काम तो कोई भी हो हर काम में मेहनत जरूरी है,और मिडिया में तो और भी ज्यादा खुद को जोखिम में डालने वाली बात है,...
पत्रकारिता मिशन नहीं रहा. अब कारपोरेट घरानों के हाथ में पत्रकारिता की मशाल है.उनसे हाशिये पर खड़े लोगों के हित में काम करने की उम्मीद करना बेकार है. जो बिकता है.वही छ्पता है, इसलिए पत्रकारिता को नौकरी समझकर करते रहिए. जो अखबार या टीवी में नहीं कर सकते वह ब्लोग पर करिए किसी के चाबुक की चिंता किये बिना.जनमत का काम अब ब्लोग ही करेंगे. बस इस विधा को खादपानी देते रहिए.
brajesh ji ne sahi kaha hai ki ab yah mission nahi hai.
BAHUT SUNDAR ASHISH JI APNE ACHHI TIPPANI DEE HAI.ISI TARAH SUNDAR JANKARI UPLABDH KARATE RAHIYE .ASHESH SHUBHKAMNAYEIN