(मेरे मित्र आशीष महर्षि ने अनुरोध किया कि यशवंत जी मीडिया पर कुछ लिखें। मैंने कहा- साथी, आदेश करें। उन्होंने कहा कि ये जो पत्रकारिता का पतन है उस पर कलम चलाएं। मैंने कहा- इसे पतन क्यों कहते हैं आपत? पहली बात की मार्केट इकोनामी के इस स्पीडी फेज में किसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी से यह अपेक्षा करना ही बेकार है कि वह अपना बिजनेस छोड़कर समाज और देश की नैतिकता के नाम पर काम करती रहे और एक दिन अपने प्रतिद्वंदियों से पिछड़कर बंद हो जाए। जैसे अन्य सारे बिजनेस हैं वैसे ये भी है, इसलिए ये जो विषय इस पर जो कुछ भी लिखा जाएगा वो सिवाय भाषणबाजी के कुछ न होगा। पर आशीष नहीं माने, बोले- यही लिख दीजिए। हमने कहा- बिलकुल, उत्तम विचार है, चलो लिखता हूं। और बस, इसके बाद इस शीर्षक से ....मीडिया से संपादकीय नैतिकता की अपेक्षा न रखें....लिख रहा हूं। पसंद आए तो कमेंटियाइए, न आए तो भी। ---य़शवंत)
बाजार का स्पीडी फेज है। ध्यान दें, इनिशियल नहीं। वो राजीव गांधी वाला काल नहीं, नरसिंहराव वाला काल नहीं। ये मनमोहनी काल है। इसमें मार्केट इकोनामी अपने पूरे स्पीड में है। सेंसेक्स कुछ कुछ सेक्स की तरह मजा दे रहा है, कर्ताधर्ताओं को। कंपनियां खूब कमा रही हैं। कंपनियां खूब आ रही हैं। जो जहां हैं वहां अपने हाथ-पांव फैला रहा है। दोनों हाथों से बटोर रहा है। नई नीतियों की देन ने देश को बेरोकटोक बना दिया है। कमा सके तो कमा। बना सके तो बना। दिमाग ला, टैलेंट ला। खूब पैसे दो। और खूब पैसे बटोरो। क्या इन सब बातों से मीडिया अनजान बना है या बनना चाहेगा? बिलकुल नहीं। आजादी के सपनों के साथ अपने विजन को जोड़कर शुरू हुए हिंदी अखबारों ने इस स्पीडी इकानामी वाले दौर में अपना सारा चोला उतार फेंका है। उन्हें ढेर सारी चिंताओं से जूझना पड़ रहा है। मार्केट में एक फील्ड में कई कई खिलाड़ी है। सब ग्लोबल हैं। मतलब टेक्नालाजी में ग्लोबल, विजन में ग्लोबल, कंटेंट में ग्लोबल। और इन्हें ग्लोबल कंपटीटर से लड़ना है या लड़ना होगा। ऐसे में उन्होंने अपने सारे अस्त्र शस्त्र ठीक करने शुरू कर दिये हैं। सर्कुलेशन की वो टीम रखो जो बेहद प्रोफेशनल हो, ग्लोबल विजन से लैस हो, नए चैलेंजेज से वाकिफ हो। मार्केटिंग में वो गुरु ले आओ जो रेवेन्यू को डबल ट्रिपल कर सकें। इसके लिए जो जितना पैसा ले, दे दो। अखबार को प्रोडक्ट बनाओ और प्रोडक्ट को एक बेहद फेमस ब्रांड में तब्दील कर दे। ब्रांड चमकेगा तो प्रोडक्ट खुद ब खुद बिकेगा। ब्रांड कंटेंट से बनता तो है ही लेकिन उससे ज्यादा महत्वपूर्ण मार्केटिंग हो गई है। मार्केटिंग अगर ठीक नहीं है तो अच्छे से अच्छे क्वालिटी और कंटेंट वाला सामान भी कूड़ा साबित होगा, कंपटीशन में। और मार्केटिंग सही है तो थोड़ा कमतर प्रोडक्ट भी अच्छा बिकेगा, दौड़ेगा बाजार में। पेप्सी-कोक को देखिए। माल वहीं है, बस विज्ञापन नया होता है, नारा नया होता है। बोतलों की साइज बदलती रहती है, ब्रांड एंबेसडर बदलते रहते हैं। खूब बिक रहे हैं, खूब कमा रहे हैं। हर साल गजब का मुनाफा ला रहे हैं। कौन देखता है कि इन बोतलों में क्या है। कुछ न सवाल खड़ा किए तो उसके जवाब में ऐसी मार्केटिंग रणनीति छेड़ी इन कंपनियों ने कि फिर ये ब्रांड सबकी जुबान पर आ गए, स्वाद देने लगे।
बात अखबारों की करनी है, इसलिए थोड़ी भूमिका बांधनी पड़ी। सारे बड़े अखबार एक प्रोफेशनल और कारपोरेट विजन से काम करने में जुटे हैं। उनकी संपादकीय टीम इस विजन से अलग नहीं हो सकती। वहां, नये नियम कानून चुपके से आ रहे हैं, जगह बना रहे हैं, लागू हो रहे हैं, चल रहे हैं। ढेर सारी संपादकीय साथियों को इसकी भनक तक नहीं लगती। बस, उन्हें दिक्कत महसूस होने लगती है। पहले तो ऐसा नहीं होता था, पहले तो यह सब नहीं था, ये क्या हो रहा है, किधर जा रही पत्रकारिता....जैसे ढेरों सवालों के जरिए अपनी दिक्कतों को आवाज देने लगते हैं। पर इनका जवाब कौन देगा? जवाब देने वाले कारपोरेट विजन को अपनाने की ट्रेनिंग लेने में लगे हैं। उन्हें यही समझाया जा रहा है, प्रोडक्ट और ब्रांड को क्वालिटी दो। और आज क्वालिटी के पैरामीटर्स क्या है? अखबारों की बात करें तो एडीटोरियल क्वालिटी का मतलब हो गया है... जो पढ़ा जाए। जो पढ़ा जाए भी मोटा वाक्य है, इसे और पतला करें। कौन पढ़े....रिक्शा वाला नहीं, गरीब नहीं, बिना पैसा वाला नहीं.....नौजवान पढे़ और पैसे वाला हो। सबसे ज्यादा युवा हैं देश में। उनको टारगेट रखो। तो आज का युवा क्या पढ़ता है? सर्वे एजेंसियों ने बताया है कि ये युवा नए जमाने का है और उसे पुरानी चीजें पुराने अंदाज पसंद नहीं। उसे राजनीति न दो। उसे समाज की समस्याओं ने गिनाओ। उसे खून खच्चर और गोलीबारी में न उलझाओ। ये सब संक्षेप में ले जाओ। पढ़ाओ पैसे-रुपये, नेट, तकनालजी, गैजेट्स, ग्लैमर, सेक्स, टेंशन.......। और जब ये सब पढ़ाओगे, उन्हें पहले पन्ने पर ले आओगे, इन्हें कैरीकेचर, कार्टन, पैकेज के साथ परोसेगो तो भला कौन नहीं निगाह मारेगा। सेक्स की बातें कोई करता नहीं लेकिन सेक्स से जुडी खबरें सब पढ़ते हैं। बस, सेक्स पढ़ाने और उसे प्रजेंट करने के दौरान साफ्ट रहो, एस्थेटिक बने रहो। देखो, सब सर आंखों पर रखेंगे। गंभीरता बनाये रखो। अखबार को न्यूज वाला लगना चाहिए इसलिए गंभीर हार्ड न्यूज को भी दे लेकिन उसके साथ ढेरों इन्नोवेशन करो। सिर्फ ये नहीं कि मुशर्रफ न वर्दी उतार दी। उतार दी वर्दी, ये तो पता है, पता चल जाएगा लेकिन वर्दी कैसे उतारी....उसकी कहानी बताओ। वो कहानी राजनीतिक शब्दावलियों से न भरी अंटी हो। उसे जवानी दो, उसे युवापन से भर दो, उसे अल्हण बनाओ। लगे जैसे मुशरर्फ ने वर्दी उतारी है तो उनसे कुछ पाया जा सकता है, उनसे कुछ सीखा जा सकता है, उनसे कुछ ह्यूमर निकाला जा सकता है, उनसे कुछ कहानियां बनाई जा सकती हैं। मतलब जो कुछ भी है उसके साथ ढेरों इन्नोवेशन करो।
बात संपादकीय नैतिकता की अपेक्षा की हो रही है। कंटेंट के लेवल पर जब हमने पुराना चोला उतार कर नया पहन लिया है, और ये जो नया है मार्केट ओरियेंटेड है, टीजी (टारगेट ग्रुप) ओरियेंटेड है, इसका मतलब है कि रेवेन्यू ओरियेंटेड है तो फिर पत्रकारों या कंटेंट जनरेट करने वालों से भी अपेक्षा की जाएगी वो नई चीजों को समझें। उसे बहुत जल्दी अपने भेजे में उतारें। उस पर जल्दी अमल करें। और ये जल्दी जल्दी की अपेक्षा कई लोगों को समझ में नहीं आ रही। इसलिए उन्हें दिक्कत हो रही।
मेरे खयाल से दिक्कत नहीं होनी चाहिए क्योंकि पहली बात किसी एक माध्यम से इस नए और बदले दौर में इतनी अपेक्षा रखनी नहीं चाहिए। वजह, हर माध्यम की हर समय एक खास वैल्यू होती है। उदाहरण देते हैं...कभी रेडियो ही रेडियो था। रेडियो में काम करने वाले सेलीब्रिटी हुआ करते थे, अब नहीं हैं। रेडियो की जरूरत नए समय में कम होती गई। उसकी जगह टीवी ने ले ली। टीवी के चेहरे अब सेलीब्रिटी की श्रेणी में हैं। टीवी नेशनवाइड दिखता है, प्रभाव क्रिएट करता है इसलिए टीवी का चेहरा पूरे देश का जाना पहचाना चेहरा बन जाता है। लेकिन टीआरपी के खेल ने जिससे कि विज्ञापन और विज्ञापन से रेवेन्यू जुड़ा हुआ है, इन माध्यमों को ऐसी लड़ाई में उतार दिया जिससे अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इन टीवी न्यूज चैनलों के लिए संपादकीय नीति क्या है। मतलब, अगर आप टीवी में हैं तो कनफ्यूज हैं कि आप को दिखाना क्या है, करना क्या है। जितने भी चैनल हैं वो हर दिन नए रयोग कर रहे हैं। कभी गंभीर कहा जाने वाले चैनल अपने किसी प्राइम टाइम में माधुरी के नच ले फिल्म के बहाने फिल्मों में हीरोइनों के डांस पर पैकेज दिखाने लगता है तो कभी कोई चैनल किसी एक शहर में सीएम के पुतला दहन और पत्रकारों की पिटाई को देश की सबसे बड़ी खबर बनाकर पेश करता है। कभी हंसी और ठहाके के कार्यक्रमों को लाइव कवरेज दिया जाता है तो कभी इतना क्रिकेट क्रिकेट होता है कि समझ में नहीं आता कि देश की सबसे बड़ी खबर किस चैनल पर खोजें। तो अगर कोई टीवी पत्रकार संपादकीय नीति की अपेक्षा करता है, किसी नैतिकता की अपेक्षा करता है तो शायद उसे उसकी अल्पबुद्धि ही माना जाएगा। एक नई चीज हो रही है, जो न्यूज के इस समय के परंपरागत माध्यम हैं- अखबार और टीवी, इनके मार्केट ओरियेंटेड हो जाने से वो जो खबरें इन पर आनी चाहिए थी लेकिन नहीं आ रही, वो अब कहीं और प्रकट हो रही हैं। अब इसे देखना होगा कि ये जा कहां रही हैं। मेरे खयाल से ब्लाग एक नए मीडिया माध्यम के रूप में उभरे हैं जिसमें अपनी आंखों देखी को खबरों के रूप में लिखा -पढ़ा जाता है। ब्लाग में बातें खुलकर लिखी जाती हैं, यहां कोई रेवेन्यू या मार्केट का इशू नहीं है। यहां चूंकि चीजें खुद की नैतिकता और विजन से जुड़ी हैं इसलिए जाके रही भावना जैसी के अंदाज में हर ब्लाग अपना एक कैरेक्टर लिए हुए है। उदाहरण दे दूं...एक साथी ने सवाल किया, नोएडा में कोई ऐसी संस्था है जो गरीब व अनाथ बच्चियों की देखभाल करती हो, तो उन्हें कहा गया कि वो इस बात को ब्लाग पर डाल दें, कोई न कोई ब्लागर साथी जरूर मदद करेगा। तो ये जो काम अखबारों के माध्यम से होता था, अखबारों में फोन करके होता था, वो अब ब्लागों के जरिये हो रहा है। जो गंभीर बहस मुबाहिसे अखबारों में नहीं छपते वो अब ब्लागों पर चलते हैं। नंदीग्राम पर जिस तरह की बहस मोहल्ला ब्लाग पर हुई, असम में नंगा करके लड़कियों औरतों की पिटाई पर जो बातें मोहल्ला पर दी गईं वो मीडिया को आइना दिखाने के लिए काफी है। इसका सीधा संदेश मीडिया को है--- मार्केट को पकड़ो लेकिन इतना नहीं कि बाद में कहीं अपना ही चेहरा आइने में पहचान में न आए। मीडिया पर जो चीजें होनी चाहिए वो ब्लागों पर लिखी जा रही हैं, इसीलिए अखबार अब मजबूर हैं ब्लाग के बारे में बात करने के लिए। लोग शायद इसीलिए इन ट्रेडीशनल मीडिया के बारे में कम विश्वास रखते हैं। अखबार और टीवी से जानी सुनी बातों पर लोगों का भरोसा कम हुआ है। लोग कहते हैं---अरे, इन टीवी वालों का क्या भरोसा, पता नहीं क्या चीज तिल का ताड़ बनाकर दिखा दें। इसीलिए तो एक टीवी चैनल सेक्स से जुड़े सवाल जवाब के जरिए खूब टीआरपी बटोरने में सफल हुआ।
मैं अपनी बातों को समेटना चाहूंगा। कुछ संकेत देना चाहूंगा। बहस आगे बढ़ाने के लिए कुछ प्वाइंट छोड़ना चाहूंगा....
1- परंपरागत मीडिया नए दौर में नए हथियारों से लैस हो रही है क्योंकि उसे एक ऐसे मार्केट में कंपटीट करना है जहां सारा खेल टीआरपी और प्रसार पर आधारित होता है और टीआरपी व प्रसार के फंडे संपादकीय की परंपरागत नैतिकता से अलग हो चुके हैं, इसलिए क्या मीडिया को टीआरपी व प्रसार की चिंता छोड़कर संपादकीय नैतिकता को पकड़ने रखना चाहिए, खुद के नष्ट हो जाने की आशंका के बावजूद या फिर मार्केट इकानामी में सरवाइवल के सारे हथियारों से लैस होकर मीडिया के हर कल पुर्जे को नए अंदाज में ढालना चाहिए ताकि ग्लोबल वार में वे हर तरह से मुकाबला कर सकें, सरवाइव ही नहीं बल्कि चैंपियन बन सकें.....तो इतनी बड़ी चिंता की अनदेखी संपादकीय नैतिकता के पैरेकारों को करना चाहिए?
2- मीडिया के नए विजन को समझते हुए उसकी सीमाओं और मजबूरियों को अच्छी तरह देखते हुए उससे अपेक्षा भी उतनी ही रखनी चाहिए ताकि बाद में खुद को और समाज को निराश न होना पड़े या फिर मीडिया से उसके मीडिया होने के बारे में सवाल शुरू किये जाने चाहिए ताकि वो अपनी मूल आत्मा को जिंदा रखे और बाजार से निपटने की प्रचलित की बजाय नई रणनीति पर विचार करे
3- अन्य कंपनियों और प्राइवेट लिमिटेड की तरह मीडिया को भी खूब मुनाफा कमाने की छूट दी जानी चाहिए या फिर उससे मीडिया होने के नाते उसकी देश व समाज के प्रति जवाबदेही के बारे में सवाल किया जाना चाहिए। जैसा कि कपिल सिब्बल ने एक सेमिनार में कहा था कि इस समस्या का हल यही है कि प्राइवेट लिमिटेड की पद्धति को खत्म कर एक ट्रस्ट के रूप में मीडिया हाउसेज को चलाने के लिए दबाव बनाया जाना चाहिए या कानून बनाना चाहिए
4- जो यह नया दौर है उसमें न्यूज की परंपरागत परिभाषा के आधार पर मीडिया का मूल्यांकन करने और बात करने का मतलब ही नहीं। हर दौर में वैल्यूज अलग अलग होते हैं। आज जो वैल्यूज स्वीकारे जाते हैं वो कभी पाप माने जाते थे। तो उसी तरह जो बदला हुआ न्यूज वैल्यू टीवी व अखबार में दिख रहा है उसे इस समय और समाज का सच मानना चाहिए अन्यथा खुद के दिमाग की खिड़कियों के सही होने पर सवाल करना चाहिए कि क्या बदले दौर में पुराने तरीके से सोचकर हम खुद को ही तो परंपरागत नहीं साबित करने में लगे हैं.
जो भी है, यह सब लिखते हुए लगता है कि आशीष ने वाकई एक ठीक विषय को पकड़ा है। हालांकि इस विषय पर मोहल्ले में दिलीप मंडल जी ने कुछ दिनों पहले एक बेहद उम्दा किस्म का आर्टिकल लिखा था। उसमें भी यही बातें थीं कि लाला से पैसे लेकर हमें क्रांति की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। मेरे खयाल से दिलीप जी की यह हेडलाइन ही ढेर सारी बातें कह देती हैं।
फिलहाल इतना ही
यशवंत सिंह
(लेखक 12 वर्षों तक प्रिंट मीडिया से जुड़े रहे हैं। एडीटोरियल कंटेंट की दुनिया में ट्रेनी से एनई तक की यात्रा करने के बाद अब वे मार्केटिंग व रेवेन्यू जनरेशन का काम देख रहे हैं। फिलहाल मोबाइल कंटेंट प्रोवाइडर कंपनी LiveM में बतौर वाइस प्रेसीडेंट काम करते हैं। एक चर्चित ब्लाग भड़ास का संचालन भी करते हैं। इनसे yashwantdelhi@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है)
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