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बोल हल्‍ला के पाठकों और प्रमोद जोशी को सलाम

Monday 31 December 2007 9 comments

पाठकों की बेनपाह मोहब्‍बत का ही नतीजा है कि दिल्‍ली से छपने वाले प्रमुख समाचार पत्र हिन्‍दुस्‍तान दैनिक में एक लेख में आपके अपने ब्‍लॉग बोल हल्‍ला की तारीफ प्रमोद जोशी ने की है, जो कि हमारे उत्‍साहवर्धन के लिए काफी है, यदि पाठकों का ऐसा ही प्‍यार मिलता रहा तो बोल हल्‍ला एक नई बुलंदी छू सकता है। हिन्‍दुस्‍तान दैनिक के पूरे लेख को पढ़ने के लिए लेख पर क्लिक करें। प्रमोद जोशी और आप सभी लोगों को दिल से मेरा सलाम

पूरे लेख के लिए यहां क्लिक करें




आप सभी पाठकों से अनुरोध है कि यदि आपके पास मीडिया से जुड़ी कोई भी न्‍यूज है तो आप उसे bolhalla.bolhalla@gmail.com पर ई मेल कर सकते हैं।

Just visited http://bolhalla.blogspot.com/ Read the full story

Newspaper gets three days for filing reply

Saturday 29 December 2007 0 comments

The Delhi Assembly was told by the Speaker, Prem Singh Chaudhary, on Friday that he had given three days’ time to The Times of India -- which had been summoned on Thursday following a breach of privilege and contempt of the House motion -- for filing a reply।


The Speaker said the newspaper employees who had been summoned had presented themselves before him on time at 11 a.m. and sought three days’ time to furnish a reply. The request, he added, had been granted.
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मीडिया खबर »

मीडिया से जुड़ी तीन खबरें

Friday 28 December 2007 0 comments

दिल थाम कर बैठ जाएं। बोल हल्‍ला पत्रकारिता जगत की तीन खबरों के साथ आपके दरबार में पेश है। खबर पसंद आए तो अपनी राय से अवगत कराना मत भूलिएगा और यदि नहीं आए तो भी आप मुझे bolhalla.bolhalla@gmail.com पर ई मेल के जरिए बता सकते हैं। यदि आपके पास ऐसी ही कोई खबर है इसे भी भेजा जा सकता है। इसके अलावा यदि आप बोल हल्‍ला में कुछ लिखना चाहते हैं और इस मंच पर आप सभी का स्‍वागत है।

सकाल लाएगा चैनल
महाराष्‍ट्र का प्रमुख समाचार समूह सकाल जल्‍दी ही दो जनरल मनोरंज टेलीविजन चैनल और एक अंग्रेजी समाचार पत्र शुरु करने जा रहा है। सकाल समूह अभी सकाल और गोमंत्रक नाम से मराठी भाषा और गोमंत्रक टाइम्‍स और महाराष्‍ट्र हैराल्‍ड नाम से अंग्रेजी में समाचार पत्र प्रकाशित करता है।

एक चैनल का नाम शाम मराठी और और दूसरे का शाम हिन्‍दी होगा । शाम मराठी सबसे पहले लांच होने की उम्‍मीद है। जबकि अप्रैल 2008 में पूणे से अंग्रेजी समाचार पत्र प्रकाशित होना शुरु हो जाएगा। अन्‍य शहरों में बाद में इसका प्रकाशन किया जाएगा।

आशीष आईनेक्‍सट में
जयपुर दैनिक भास्‍कर से आशीष पांडेय ने आईनेक्‍सट कानपुर ज्‍वाइन किया है।

अजीत सिंह हिन्‍दुस्‍तान में
जयपुर न्‍यूज टुडे में उपसंपादक रह चुके अजीत सिंह ने मेरठ हिन्‍दुस्‍तान में बतौर रिपोर्टर ज्‍वाइन किया है। बीच में एक साल वे अहमदाबाद में एक एनजीओ में काम कर रहे थे। Read the full story

इंडियन एक्‍सप्रेस को चाहिए रिपोर्टर

0 comments

यदि आप इंडियन एक्‍सप्रेस में रिपोर्टर या वरिष्‍ठ रिपोर्टर के रुप में कार्य करना चाहते हैं तो तुरंत अपना सीवी वरुण अग्रवाल को उनके ई मेल आईडी varun.aggarwal@expressindia.com पर भेज दें। आप चाहें तो 09873080997 पर उनसे सीधे बात भी कर सकते हैं। उन्‍हें दिल्‍ली के लिए लोगों की तलाश है। यदि आप पत्रकारिता में नए हैं तो भी यहां अपना ई मेल भेज सकते हैं।

नेक्स्ट इलाहाबाद से भी

दैनिक जागरण समूह के कांपैक्ट साइज के डेली न्यूज पेपर आई नेक्स्ट के इलाहाबाद संस्करण की शुरुआत बुधवार को हुई। कानपुर, लखनऊ, मेरठ, आगरा और वाराणसी के बाद इस नगरी से आई नेक्स्ट का यह छठा संस्करण है। दैनिक जागरण समूह ने पिछले साल दिसंबर में आई नेक्स्ट के कानपुर और लखनऊ संस्करण के साथ उत्तर भारत का यह पहला बाइलिंगुअल कांपैक्ट लांच किया था। कानपुर में हर रोज 76 हजार प्रतियों के प्रसार के साथ अगस्त में आई नेक्स्ट को शहर के नंबर दो दैनिक का दर्जा हासिल हुआ। लखनऊ में भी 64 हजार प्रतियों के साथ यह अखबार शहर का दूसरा सबसे बड़ा दैनिक बनने की ओर अग्रसर है। 37 हजार प्रतियों के प्रसार के साथ आई नेक्स्ट मेरठ में भी दूसरा बड़ा अखबार बनने के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। आगरा में 30 हजार प्रतियों के साथ आई नेक्स्ट इस मुकाम को हासिल करने के बेहद करीब है। वाराणसी में 45 हजार प्रतियों के साथ आई नेक्स्ट दूसरे नबंर का डेली Read the full story

मीडिया »

राजस्‍थान पत्रि‍‍का की निगाह मध्‍यप्रदेश पर

Thursday 27 December 2007 1 comments

राजस्‍थान पत्रि‍‍का मध्‍यप्रदेश में पूरे जोर शोर से प्रवेश के लिए तैयार है। बोल हल्‍ला को मिली जानकारी के अनुसार पत्रि‍‍का ने राज्‍य की राजधानी भोपाल में एक प्रिटिंग प्रेस लगाने की तैयारी कर रही है। भोपाल के गोविंदपुरा में यह प्रेस लग रही है। राजस्‍थान पत्रि‍‍का राजस्‍थान का सबसे बड़ा अखबार है।


हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स को चाहिए चीफ सब एडिटर


हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स, कोलकात्‍ता को चीफ सब एडिटर और डिप्‍टी न्‍यूज एडिटर की आवश्‍यकता है। यदि आपको लगता है कि आप इन पोस्‍ट के काबिल हैं तो अपना सीवी recruitmentht@gmail.com पर ई मेल कर सकते हैं।


जीबीएन करेगी 500 करोड़ रुपये का निवेश


ग्लोबल ब्राडकास्ट न्यूज [जीबीएन] लिमिटेड ने 500 करोड़ रुपये की निवेश योजना बनाई है। जीबीएन इसके तहत अमेरिका की दिग्गज मीडिया कंपनी वियाकाम के साथ मिलकर एक एंटरटेनमेंट चैनल शुरू करेगी। इसके अलावा कुछ क्षेत्रीय समाचार चैनल भी शुरू करने का निर्णय लिया गया है। वियाकाम दरअसल एमटीवी और वीएच1 चैनलों का प्रसारण करती है। जीबीएन का प्रस्तावित संयुक्त उद्यम 'वियाकाम 18' भारत में एमटीवी नेटवर्क के मौजूदा चैनलों का संचालन करेगा।


पंकज तोमर आईबीएन में


पंकज तोमर सहारा समय छोड़कर आईबीएन7 नोयडा में वरिष्‍ठ कैमरामेन ज्‍वाइन कर लिया है। पंकज तोमर पंकज मे‍हता की टीम के सदस्‍य होंगे। पंकज ने एशियन एकेडमी ऑफ फिल्‍म एंड टेलीवीजन से डिप्‍लोमा किया है।
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मीडिया », मेहमान का पन्‍ना »

जमाना वेब पत्रकारिता का है जनाब

Wednesday 26 December 2007 10 comments

कमल शर्मा

परिवर्तन संसार का नियम है और इस नियम से मीडिया जगत भी अछूता नहीं है। समाचार, विचार और सूचनाएं पाने के पहले जहां दो मुख्‍य स्‍त्रोत अखबार और रेडियो थे, वहीं इसमें समय के साथ परिवर्तन देखने को मिले और इलेक्‍ट्रॉनिक माध्‍यम यानी टेलीविजन ने इस ओर कदम रखे। उस समय अनेक लोगों की राय उभरी की समाचार और सूचना का यह माध्‍यम बेहद सशक्‍त है जो अखबार एवं रेडियो को जल्‍दी ही इतिहास बना देगा। लेकिन सच्‍चाई इसके विपरीत रही। टीवी न्‍यूज चैलनों के विकास के साथ-साथ अखबार पढ़ने और रेडियो सुनने वालों की संख्‍या में कहीं कोई कमी दिखाई नहीं दी। रेडियो का जहां एफएम फ्रीकवेंसी पर विस्‍तार हो रहा है, वहीं अनेक नए अखबारों के आने के साथ पुराने अखबारों के नए-नए संस्‍करण निकल रहे हैं। अब इस कड़ी में वेब पत्रकारिता जुड़ गई है।

हालांकि वेब पत्रकारिता एकदम नई नहीं है। भारत में इसका आगमन तकरीबन दस साल पहले हुआ। लेकिन डॉट कॉम कंपनियों की माली हालत वर्ष 2002 के आसपास इतनी तेजी से बिगड़ी की, इस पत्रकारिता के अस्तित्‍व पर ही सवाल लग गया। लेकिन कुछ कंपनियों ने अपनी समाचार वेबसाइटों को जैसे-तैसे जीवित रखा और विज्ञापनों खासकर गुगल सर्च इंजन जैसे विज्ञापनों और दूसरे उत्‍पादों की सेवाओं के सहारे इन्‍हें बनाए रखा। हालांकि, जब से अखबारों ने अपनी वेबसाइटों को बनाया है, मीडिया के इस माध्‍यम में फिर से जोश दिखाई दे रहा है। इस जोश को बढ़ाने में बड़ा योगदान विदेशी कंपनियों गुगल, याहू, एमएसएन का भी है जो हिंदी व अन्‍य भारतीय भाषाओं के महत्‍व को समझते हुए इन्‍हें तेजी से अपने यहां जगह दे रही हैं।

हिंदी वेब पत्रकारिता की बड़ी कमी उसकी अच्‍छी शब्‍दावली न होना है। अखबार में जहां हम समाचार पढ़ते हैं, वहीं इलेक्‍ट्रॉनिक और रेडियो माध्‍यम में उन्‍हें सुनते हैं, जबकि वेब में समाचारों को देखा जाता है। पढ़ने, सुनने और देखने की अलग-अलग विशेषताओं की वजह से यहां काम में आने वाले शब्‍दों का चयन भी इसी के अनुरुप करना पड़ता है। तीनों माध्‍यमों के शब्‍दों को एक दूसरे में काम में लेने से इसका वास्‍तविक आनंद कम हो जाता है। इस समय वेब में जो कुछ लिखा जा रहा है, उसमें लेखक जो लिख रहे हैं या फिर जो समाचार आ रहे हैं वे जस के तस जा रहे हैं। वेब पत्रकारिता के लिए जरुरी देखने वाले शब्‍दों को गढ़ने का कार्य अभी शुरू नहीं हुआ है। यहां एक और अहम बात देखें तो वेब पत्रकारिता में आने वाले पूर्णकालिक पत्रकारों की संख्‍या प्रिंट और इलेक्‍ट्रॉनिक माध्‍यम की तुलना में काफी कम है। प्रिंट और इलेक्‍ट्रॉनिक माध्‍यम में काम कर रहे पत्रकारों का ही वेब पत्रकारिता में अधिक योगदान है। इन्‍हीं माध्‍यमों के पत्रकार समय-समय पर स्‍टोरी और लेख से वेब पत्रकारिता को आगे बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं।

पत्रकारिता में आने वाले नए चेहरों का पहला आकर्षण इलेक्‍ट्रॉनिक माध्‍यम और दूसरा प्रिंट माध्‍यम है। लेकिन वेब पत्रकारिता आने वाले समय का सशक्‍त माध्‍यम है और इसे इस समय की बुनियादी मेहनत से ताकतवर बनाया जा सकता है जिसके लिए नए चेहरे कम ही तैयार दिख रहे हैं। यहां एक गलतफहमी भी दूर करना चाहेंगे कि कुछ लोग मानते हैं कि वेब का मतलब है कि दफ्तर या घर में बैठकर समाचारों, विचारों और स्‍टोरी का अनुवाद अथवा संपादन कर वेबसाइट में डालना। लेकिन यह पूरी तरह गलत है। हालांकि, जो लोग ऐसा कर रहे हैं वे यह जान लें कि उनकी वेबसाइट इस समय चल सकती है लेकिन उनका अंत भी नजदीक है। समाचारों के लिए चल रही वेबसाइटें न्‍यूज एजेंसियों का वैसे ही सहारा ले रही है, जैसा कि प्रिंट, रेडियो और इलेक्‍ट्रॉनिक माध्‍यम वाले लेते हैं। अनेक समाचार वेबसाइटों के पास रिपोर्टरों की भी टीम है जो तेजी से समाचार अपडेट कर रहे हैं। अपनी रिपोर्टर टीम खड़ी कर वेबसाइट पर आने वाले वर्ग की जरुरत की नब्‍ज को पहचानकर जो समाचार व सूचनाएं देगा वही वेबसाइट आगे चल पाएगी। देश में तेजी से बढ़ रहे कंप्‍यूटरीकरण और ब्राड बैंड सेवा ने वेब पत्रकारिता के विस्‍तार को भी बढ़ाया है। जहां अभी भी टीवी चैनल और अखबारों की पहुंच नहीं बन पाती है, वहां इंटरनेट कनेक्‍शन लोगों को देश दुनिया के साथ संपर्क में रख सकता है। अखबारों के ई संस्‍करण उन क्षेत्रों में आसानी से पहुंच जाते हैं, जहां उनकी छपी कॉपियां नहीं पहुंच पाती। अब इसमें एक और परिवर्तन देखने को मिला है और वह है मोबाइल सेवाओं का विस्‍तार। डेस्‍क टॉप या लैपटॉप न होने की दिशा में मोबाइल पर वेबसाइट खोलकर समाचारों और सूचनाओं को जाना जा सकता है।

देश में बिजली की कमी, कंप्‍यूटर की लागत और ब्राड बैंड सेवा/इंटरनेट उपयोग का महंगा शुल्‍क वेब के विस्‍तार में मुख्‍य अड़चन है, लेकिन देश को आर्थिक महासत्‍ता बनाने के लिए बुनियादी सुविधाओं जिसमें बिजली भी शामिल है, को तेजी से बढ़ाया जा रहा है। उम्‍मीद की जा सकती है कि आने वाले कुछ वर्षों में बिजली की कमी पूरी तरह दूर हो जाएगी। साथ ही ब्राड बैंड सेवा अपने विस्‍तार के साथ सस्‍ती होती जाएगी। इसी तरह कंप्‍यूटरों की लागत को भी पिछले कुछ वर्षों में वाकई कम किया गया है और आज एक लैपटॉप, डेस्‍कटॉप से सस्‍ता हो गया है। लेकिन अभी इसके दाम और नीचे लाने की जरुरत है जिसके प्रयास चल रहे हैं। इन तीन पहलूओं पर यदि तेजी से काम होता है तो समाचार और सूचनाओं का अगला सबसे ताकतवर माध्‍यम वेब पत्रकारिता ही होगा, इसमें अचरज नहीं है। प्रिंट और इलेक्‍ट्रॉनिक माध्‍यम की तुलना में वेब पत्रकारिता बाल्‍यवस्‍था से गुजर रही है, इसे युवा बनने दीजिए फिर यह भी तेजी से दौड़ेगी। आइए स्‍वागत करें पत्रकारिता के इस शिशु का।

(लेखक नेटवर्क 18 समूह से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार हैं। आर्थिक मसलों खासकर शेयर बाजार पर ज्‍यादा ध्‍यान रहता है और वाह मनी नामक आर्थिक ब्‍लॉग का संचालन करते हैं) Read the full story

मीडिया », मेहमान का पन्‍ना »

मीडिया और युवा

Monday 24 December 2007 4 comments

राजीव जैन


मीडिया
में युवाओं के आने का पता नहीं पर इतना जरूर है कि मीडिया की चकाचौंध नए नवेले लडकों को मीडिया की ओर आकर्षित करती है। प्रणव राय, राजदीप सरदेसाई, संजीव श्रीवास्‍तव या पुण्‍य प्रसून बनने की चाहत उन्‍हें इस पेशे में ले आती है। लेकिन पहले दिन से जब कलम घसीटना शुरू करते हैं तो लडकों को पता चलता है कि ये ग्‍लैमर यूं ही नसीब नहीं होता। बस उन्‍हें तो अब तो अमिताभ बच्‍चन से गप्‍प लडाता रिपोर्टर या प्रधानमंत्री के साथ विदेश दौरे पर जाते पत्रकार या शाहरुख से सवाल दागते रिपोर्टर ही रिपोर्टर के रूप में दिखाई देते थे।

पुलिस से पिटते, एक कीचड वाली सडक और बोरिंग से फालतू टाइप के लेक्‍चर की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार तो कभी उनके आदर्श थे ही नहीं। अब जब इस तरह से आ ही गए तो सोचते हैं कि जब तक नई नौकरी नहीं मिलती, यहीं रोजी रोटी कमा ली जाए। बस फिर कुछ भगा दिए जाते हैं और कुछ छोड भागते हैं। अब ऐसा भी नहीं है कि सारे लोग सिर्फ इसीलिए आते हैं। इनमें से कुछ ऐसे भी होते हैं जिनके खून में ही पत्रकारिता होती है। वे आए ही इसीलिए हैं कि दुनिया को बदल कर रख देंगे। ढूंढ कर लाते हैं एकदम धांसू टाइप की स्‍टोरी, मंत्री को सलटा देंगे या प्रशासन की बैंड बजा देंगे।

लेकिन ये क्‍या स्‍टोरी जब तक हवा में थी अच्‍छी थी, पर संपादकजी की टेबल तक पहुंची तो जितनी बडी स्‍टोरी थी उससे ज्‍यादा लंबी तो उन सवालों की सूची हो गई जो उस स्‍टोरी के छपने के बाद खडे हो सकते हैं। बस उसका जवाब सोचते-सोचते वह इस पत्रकारिता से या तो बायकॉट कर देता है या फिर दुनिया को बदलने का ख्‍वाब बदल अब जो मिल जाए उस में ही सुखी रहने की राह पर निकल पडता है।

मेरे तर्क में इसलिए भी दम हो सकता है, क्‍यूंकि एमजेएमसी के साथ या बाद में मैं यह तीसरा बैच देख रहा हूं कि पत्रकारिता के हर स्‍टूडेंट को बस रिपोर्टर बनने की धुन सवार है। मानो कोई भी आदमी अब डेस्‍क पर आना ही नहीं चाहता। क्‍यूंकि उसे पता है डेस्‍क पर तो तब भी बिठा दिए जाएंगे, जब बतौर रिपोर्टर सरवाइव करने की गारंटी नहीं होगी। (क्षमा चाहता हूं पर इस तरह के उदाहरण जयपुर में तो आम हैं।) युवाओं के पत्रकारिता से पलायन का एक और बडा कारण, जो मेरी समझ में आया वो शायद यह है कि पढाई पर खर्चा उतना ही होने के बाद एमबीए, इंजीनियरिंग, मेडिकल, सीए की तुलना में पत्रकारों को पैसे बहुत कम मिलते हैं। बेईमान लोग क्षमा चाहता हूं तो फिर भी जुगाड तुगाड करके उनकी बराबरी कर स‍कता है पर एक शरीफ पत्रकार यह भी नहीं करता। या तो वो लो प्रोफाइल तरीके से जी कर अपनी जिंदगी निकाल देता है या पलायन करने में ही भलाई समझता है।
...................................................
अपनी छोटी सी जिंदगी में पत्रकारिता को जितना समझ पाया उसी आधार पर लेख लिखने का प्रयास किया है।

(लेखक राजस्‍थान के प्रमुख मीडिया समूह से जुडे हैं और शुरुआत नाम से ब्‍लॉग लिखते हैं।)
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मीडि़या से जुड़ी कुछ खास खबरें

Friday 21 December 2007 5 comments

आप भी लिख सकते हैं न्‍यूज
यदि आपकी कोई न्‍यूज या लेख किसी समाचार पत्र में जगह नहीं पाता है तो आपको निराश होने की जरुरत नहीं है। देश में एक ऐसा पोर्टल भी है जो कि सामान्‍य आदमी की न्‍यूज और लेख को अपने पोर्टल पर स्‍थान देता है। जी हां मैं बात कर रहा हूं मेरी खबर डॉट कॉम की। यह पोर्टल हिन्‍दी के अलावा अंग्रेजी में भी है जिसका नाम है मेरी न्‍यूज डॉट कॉम। बस फिर क्‍या है अपनी की बोर्ड पर आज से ही लिखना शुरु कर बेब पोर्टल पर अपने नाम से न्‍यूज डालिए। है न मजेदार खबर। अधिक जानकारी के लिए आप मेरी खबर के संपादक वेदगिरी जी को उनके सेल नं 09826169126 या vedvgiri@gmail.com पर भी ई मेल कर सकते हैं

जागरण का एक और संस्‍करण लांच
दैनिक जागरण ने कल यानि 20 दिसंबर से पटियाला से अपने 32वें संस्करण का शुभारंभ किया। इसका स्थानीय संपादक व मुख्य महाप्रबंधक निशिकान्त ठाकुर को बनाया गया है। दैनिक जागरण ने 1999 में पंजाब में पहली बार अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। पटियाला के अलावा पंजाब के जालंधर, लुधियाना और अमृतसर से भी दैनिक जागरण का संस्करण निकलता है। पटियाला संस्करण के शुभारंभ के मौके पर स्थानीय संपादक निशिकान्त ठाकुर ने कहा कि दैनिक जागरण ने पटियाला जैसे सांस्कृतिक शहर की आवाज को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने की पहल की है।

राजस्‍थान पत्रिका में बदलाव की तैयारी
राजस्‍थान पत्रिका जल्‍दी ही अपने बेब पोर्टल में बड़ा पर्रिवतन करने जा रहा है। पत्रिका राजस्‍थान के सबसे बड़े अखबारों में से एक है।

शारदा आईबीएन7 में
शारदा शुक्‍ला ने आईबीएन 7 ज्‍वाइन कर लिया है। सूत्रों के अनुसार शारदा संजीव पालीवाल की टीम में होंगी। शारदा ने डीडी न्‍यूज के अलावा ईटीवी से भी जुड़ी रही हैं।

कुमार कार्तिक जी बिजनेस में
कुमार कार्तिक ने नेटवर्क 18 के कमोडिटी कंट्रोल डॉट कॉम के बाद जी बिजनेस का साथ पकड़ लिया है। कार्तिक जी बिजनेस के मुंबई स्थित ब्‍यूरों में हैं।

चाहिए उप संपादक
यदि आप देश के सबसे बेहतरीन अंग्रेजी अखबार टाइम्‍स ऑफ इंडिया से जुड़ना चाहते हैं तो यह आपके लिए एक शानदार खबर है। टाइम्‍स ऑफ इंडिया को अपने दिल्‍ली ऑफिस के लिए उप संपादक की आवश्‍यकता है। इसके लिए निर्धारित योग्‍ता छह से दो साल का अनुभव और अंग्रेजी में अच्‍छी पकड़ होना जरुरी है। यदि आप इसके लिए इच्‍छुक हैं तो anilgarg@acdplacements.com पर अपना रिज्‍यूम भेज सकते हैं।

मुंबई में दस्‍तक देगा भास्‍कर
खबर है कि देश का सबसे तेजी से बढ़ता दैनिक अखबार दैनिक भास्कर मुंबई में भी अपनी दस्‍तक देने जा रहा। मुंबई के लिए टीम बनाने का कार्य बड़ी तेजी से चल रहा है। इससे पहले दैनिक भास्कर ने कुछ दिनों पहले ही पंजाब के लुधियाना से अपना संस्करण लांच कर चुका है। जो कि दैनिक भास्कर का 40 वां संस्करण है। Read the full story

जागरण कैसे निकाल सकता है पहला राष्‍ट्रीय हिंदी बिजनैस अखबार

Wednesday 19 December 2007 9 comments

दैनिक जागरण का कहना है कि जागरण व नेटवर्क 18 भारत का पहला राष्‍ट्रीय हिंदी बिजनैस अखबार शुरू करने जा रहे है। लेकिन इसे पहला राष्‍ट्रीय हिंदी बिजनैस अखबार नहीं कहा जा सकता।

हमारे देश में बिजनैस पत्रकारिता की शुरुआत मुंबई के जन्‍मभूमि समूह ने की। इस समूह ने व्‍यापार अखबार गुजराती में निकाला जो आज सप्‍ताह में दो बार प्रकाशित होता है। इसके बाद समूह ने व्‍यापार हिंदी शुरू किया जो साप्‍ताहिक है। गुजराती में बिजनैस अखबार आने के बाद ही हमारे देश में अंग्रेजी में बिजनैस अखबार आए। इस तरह भारत में बिजनैस पत्रकारिता की शुरूआत गुजराती भाषा के अखबार से हुई। इसके पहले संपादक श्री गिलानी भाई के योगदान को देश की आर्थिक पत्रकारिता नजर अंदाज नहीं कर सकती। उन्‍होंने देश की आजादी के साथ ही यह मान लिया था कि भारत फिर से विश्‍व में आर्थिक महासत्‍ता बनने की हैसियत रखता है और उन्‍होंनें प्रबंधन के नकार देने के बावजूद बिजनैस अखबार यह भरोसा दिलाकर शुरू करवाया कि आने वाला समय इसका ही है, और आज यही हो रहा है। इस अखबार के दूसरे संपादक और गिलानी भाई के साथ सहायक संपादक रहे शशिकांत वसानी ने हिंदी ने बिजनैस अखबार व्‍यापार को चालू करवाया। इसलिए एक गुजराती संपादक शशिकांत वसानी का हिंदी के प्रति इस तरह का मोह होना प्रशंसा के लायक है।

दैनिक बिजनैस अखबारों की बात करें तो दिल्‍ली से कई अखबार निकल रहे हैं। लेकिन पूरी तरह से व्‍यवस्थित शुरुआत बिजनैस दैनिक अखबार इंदौर से प्रकाशित नई दुनिया ने भावताव दैनिक के साथ की। हालांकि, यह अखबार कई साल तक प्रकाशित होता रहा और उस समय बिजनैस खबरों का बड़ा क्रेज न होने से बंद हो गया। साथ ही यह अखबार मध्‍य प्रदेश तक सीमित होने से इसे राष्‍ट्रीय बिजनैस अखबार नहीं कहा जा सकता। लेकिन राष्‍ट्रीय हिंदी दैनिक अमर उजाला ने अमर उजाला कारोबार दैनिक की शुरूआत की जिसे भारत का पहला बिजनैस दैनिक राष्‍ट्रीय अखबार कहा जा सकता है। इस अखबार का अपना रिपोर्टिग व डेस्‍क पर बड़ा नेटवर्क था और भारत के हर मध्‍यम से बड़े शहर में ब्‍यूरो था। साथ ही अंग्रेजी के बिजनैस अखबारों में लिखने वाले स्‍तंभकार भी यहां लिखते थे। रविवार को पूरा एक परिशिष्‍ट भी इसमें आता था जिसमें उम्‍दा सामग्री होती थी। यह अखबार उत्‍तर भारत तक ही नहीं अन्‍य राज्‍यों में भी आसानी से मिल जाता था इसलिए प्रसार संख्‍या के हिसाब से भी इसका फैलाव अधिक था। हालांकि, शेयर बाजार की मंदी और लोगों का टेस्‍ट कमजोर होने से इसका अमर उजाला में विलय हो गया। या आप इसे कह सकते हैं बंद हो गया। हालांकि इसके पूरे स्‍टॉफ को अमर उजाला में नौकरी पर रख लिया गया। हिंदी का इकॉनामिक टाइम्‍स अमर उजाला कारोबार को कहा जा सकता है। दैनिक जागरण का कहना है कि जागरण व नेटवर्क 18 भारत का पहला राष्‍ट्रीय हिंदी बिजनैस अखबार शुरू करने जा रहे है। इसे पहला राष्‍ट्रीय हिंदी बिजनैस अखबार नहीं कहा जा सकता।

इस खबर को मेरी खबर डॉट कॉम पर भी देखा सकते हैं Read the full story

आशीष », ख़बर », मीडिया »

शहरी बाबू (मीडिया) अब तो सुधर जाओ

Saturday 15 December 2007 2 comments

यह खबर देश के सामान्य मनोरंजन चैनलों के लिए बुरी ख़बर है. TAM के नए डाटा के अनुसार सामान्य मनोरंजन चैनलों के दर्शकों की संख्या के साथ इनकी आय भी गिरी है. डाटा कहते हैं कि इनके दर्शक ५४ फीसदी के ३९ फीसदी पर और एड से होने वाली आय ५९ फीसदी से ४२ फीसदी पर आ गई है. जबकि रीजनल चैनलों के दर्शक और आय दोनों ही बढ़ी है. डाटा के अनुसार रीजनल चैनलों की दर्शकों की संख्या में दो फीसदी और आय में दस फीसदी की बढ़त आई है. है ना चिंता की बात दिल्ली और मुम्बई वालों के लिए. चलिए अब और कुछ खबरों पर चलते हैं.

अब भास्कर लाएगा आईपीओ
दैनिक भास्कर जल्दी ही एक हजार करोड़ रूपये जुटाने के लिए अपना एक आईपीओ लाने वाला है. माना जा रहा है कि अगले साल फ़रवरी में इसका आईपीओ बाज़ार में आ जाएगा. भास्कर से पहले जागरण और हिंदुस्तान टाइम्स का आईपीओ बाज़ार में आ चुका है.

विजय झा अब दैनिक जागरण के साथ
नवभारत टाइम्स वाले विजय झा अब दैनिक जागरण के साथ हो लिए हैं। विजय कुमार झा का नभाटा से दैनिक जागरण जाना उलटी गंगा बहने की तरह ही है लेकिन ये नया नहीं है.

नितिन ने आईबीएन ७ में
नितिन ने आईबीएन ७ में नॉएडा में ज्वाइन कर लिया है. नितिन संजय पालीवाल की टीम के सदस्य होंगे. इससे पहले नितिन स्टार न्यूज़ में अपनी सेवा दे चुके हैं. Read the full story

मीडिया », विशेष लेख », संजय तिवारी »

मैं तो नौकरी करता हूं, पत्रकारिता तुम करो

Thursday 13 December 2007 4 comments


--संजय तिवारी--

जब
क्षरण आता है तो समाज के हर हिस्से में आता है। इस क्षरण से पत्रकारिता भी अछूती नहीं है. पत्रकारिता करते-करते कब हम पेशा करने लगे हमें पता ही नहीं चला. बेशर्मी की हद यह की अब यह पेशा पेट पालने के अंतिम अस्त्र का प्रयोग करने लगी है. हमारे कई मित्रों ने हमारे साथ पत्रकारिता शुरू की और नौकरी करने लगे. थोड़े दिनों उन्होंने यह जज्बा बनाकर रखा कि पत्रकारिता करनी है. वह दौर तो सीखने का ही था इसलिए बहुत कुछ ऐसा नहीं कर सकते थे जिसे कहा जाए कि इसका समाज को कुछ लाभ मिला होगा. लेकिन जब थोड़ा सीख गये तब तक सीनियर होने का भूत सर पर चढ़ गया. अब एक बार किसी के सिर यह भूत चढ़ जाते तो उतारते नहीं उतरता. पेशे की यह सिनियरटी आपको मजबूर करती है कि आप सीखने की प्रक्रिया से अलग हो जाएं। क्योंकि यह सब काम तो जूनियरों का है। फिर आप अपनी कीमत आंकने लगते हैं। आपको इतना पैसा मिलना ही चाहिए नहीं तो पता कैसे चलेगा कि आप कितने सीनियर हैं और आपने अपनी कीमत बढ़ाई तो नौकरी देनेवाले मालिक ने आपकी औकात घटा दी। अब आप उसके यहां नौकरी करते हैं. हमारे कई मित्र इसी दौर में हैं जो नौकरी कर रहे हैं. कभी कोई सवाल करता हूं तो यह कहते हुए अपना पल्ला झाड़ लेते हैं कि यार नौकरी कर रहा हूं, पत्रकारिता करनी है तो तुम करो.

इस बात पर पर्याप्त बहस होती रही है कि पत्रकारिता मिशन है या प्रोफेशन. इस विषय हर पत्रकार के अपने-अपने विचार हैं. जिसके जो विचार हैं वह उसे ही अंतिम सत्य मानकर बैठा हुआ है. एक वर्ग कहता है कि यह प्रोफेशन है। सरल शब्दों में कहें तो पेशा है। वैसे ही जैसे कोई और पेशा हो सकता है। हमारा काम है सूचनाओं को लोगों पहुंचाना और हम वही करते हैं। हम जज नहीं हैं जो निर्णय दें कि क्या सही और क्या गलत। यह वर्ग जिस बारे में जरा भी विचार नहीं करता वह यह कि हमारी बुद्धि का एक हिस्सा ऐसा भी है जिसे विवेक कहते हैं. पेशा तो हम बाद में अपनाते हैं उसके पहले हम इंसान होते हैं. और इंसान होनेमात्र से वह विवेक हमें मुफ्त में मिल जाता है. अब यह हमारे ऊपर है कि हम उसका उपयोग करें या न करें. इसलिए इस तर्क में मुझे कभी कोई दम नजर नहीं आया कि पत्रकार का एक काम यह भी है कि वह कभी विवेक का इस्तेमाल न करे. पक्षपात न करे यह तो समझ में आता है लेकिन विवेक का ही दामन छोड़ दे यह तो मेरी समझ में आने से रहा.
दूसरा वर्ग मानता है कि पत्रकारिता पेशा नहीं मिशन है। हम जो काम करते हैं उसका एक लक्ष्य होता है। और उस लक्ष्य को पाने के लिए हमें पत्रकारिता करनी चाहिए। अब संकट यह है कि पहले वर्ग की तरह इस वर्ग की भी अपनी धारणाएं और बाध्यताएं हैं। यह भी उसे ही अंतिम सत्य मानता है जिसके साथ वह खड़ा है।
ऐसे में पत्रकारिता में एक तीसरे विचार का उदय होता है. आजकल इसी विचारधारा का जोर है. इस धारा का स्पष्ट लक्ष्य होता है लेकिन यह व्यवहार ऐसे करता है मानों वह किसी प्रकार का पक्षपात नहीं कर रहा है. भारत में भूमंडलीकरण का दौर चला. हर तरफ पैसे का जोर बढ़ा तो इधर भी पैसे ने आक्रमण किया. पत्रकारिता उस जड़ता से कुछ हद तक तो बाहर निकली जो लालाजी वाली मानसिकता का शिकार थी. माहौल में थोड़ी रवानगी आयी. लोगों की तनख्वाहें बढ़ने लगी. पत्रकारों में विशेषज्ञ और ब्राण्ड भी तैयार होने लगे और खबर को पूरी तरह से एक वस्तु बना दिया गया. ताजा खबर, विशेष खबर, ब्रेकिंग न्यूज जैसे हथकण्डे अपनाये जाने लगे. अब खबर सिर्फ खबर नहीं है. अब खबर एक वस्तु है जिसे आपको बाजार में बेचना है.
यह तीसरा वर्ग बाजार से प्रभावित है। यहां कोई नियम नहीं, कानून नहीं, कोई सैद्धांतिक मान्यता नहीं, कोई अच्छा और बुरा नहीं. यहां जो बिकता है वह दिखता है. अगर मौत बिकती है तो मौत ही दिखेगी. अगर हंसी बिकती है तो हंसी ही दिखेगी. इस दौर में हर कोई अपनी कीमत लगाकर बाजार में जा बैठा है. क्या पत्रकार और क्या पत्रकारों के मालिक. पत्रकार मालिक को अपनी कीमत बता रहा है, मालिक बाजार में अपनी कीमत लगा रहा है. पत्रकार भी बिक रहा है और पत्रकारों का मालिक भी. सब अपनी-अपनी कीमत लगाये घूम रहे हैं. जहां कोई ठीक खरीदार मिल गया वहीं के हो लिए.
और जानते हैं असली खरीदार कौन है। असली खरीदार है पर्दे के पीछे। वह अपना माल बेचता है. वह खबरों के बीच विज्ञापन बना नजर आता है. बाजार की इसी ताकत का प्रभाव है कि देखते-देखते एक पत्रकार सेल्समैन की जिंदगी जीने लगता है. असल में वह विज्ञापनों को बेच रहा है लेकिन उसे इस बात का पूरा भ्रम है कि वह पत्रकारिता कर रहा है.

(लेखक विस्फोट नामक ब्लॉग के संचालक हैं. उन्होंने यह लेख बोल हल्ला के लिए लिखा है.)
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टीवी १८ की झोली में इंफोमीडिया

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टीवी18 ने इंफोमीडिया इंडिया में 40 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीद ली है। इस खरीद के बाद कम्पनी में टीवी18 का सामरिक नियंत्रण हो गया है। टीवी18 ने यह हिस्सेदारी आईसीआईसीआई वेंचर से 178 करोड़ रुपए में खरीदी है। इस खरीद के बाद कम्पनी इंफोमीडिया में और 20 प्रतिशत हिस्सेदारी के लिए खुला प्रस्ताव लाएगी। यह प्रस्ताव 237 रुपए प्रति शेयर की दर से लाया जाएगा। अगर इस प्रस्ताव के जरिए टीवी18 और शेयर नहीं खरीद पाती है तो, इसके पास आईसीआईसीआई वेंचर से 13 प्रतिशत हिस्सेदारी और खरीदने का विकल्प है। Read the full story

ख़बर », मीडिया »

एक और न्यूज़ चैनल ?

Wednesday 12 December 2007 2 comments

चैनलों के इस बाज़ार में कल शाम से एक और चैनल कूदने जा रहा है. बोल हल्ला को मिली जानकारी के अनुसार कल शाम पांच बजे से बैग फ़िल्म एंड मीडिया लि. अपना २४ घंटे का न्यूज़ चैनल न्यूज़ २४ ला रहा है. इस चैनल ने युवाओं को अपना टारगेट किया है. चैनल की टैग लाइन है नज़र हर खबर पर. अब देखना यह है कि किस किस खबर पर नज़र रखी जाती है. चैनल ने देश भर में अपने तेरह ब्यूरो बनाये हैं. जबकि ३०० पत्रकारों की टीम बनाईं गई है. Read the full story

कठिन हैं डगर कानून की

Monday 3 December 2007 8 comments

मुझे नहीं मालूम कत्ल एक गुनाह है। मुझे नहीं मालूम चोरी एक जुर्म है। ऐसे में अगर मैं ये काम करता हूं तो फिर मुझे इसकी सजा क्यों मिले? प्रश्न हल्का दिख सकता है लेकिन गंभीर है। यह प्रश्न हमारे न्याय तंत्र की कलई खोलता है।


कानून कौन बनाता है, मुझे ये तो पता है लेकिन क्या कानून हैं वे मुझे नहीं पता। जब मुझे पता ही नहीं कि कानून के तहत क्या सही और क्या गलत तो मैं कानून का पालन कैंसे कर सकता हूं और कानून के न पालन करने पर मुझे सजा क्यों मिले। वकालत के छात्र पढ़ते होंगे, लेकिन बचपन से लेकर अब तक मुझे औपचारिक रुप से दीवानी-फौजदारी कानून का एक भी अंश नहीं बताया गया। मेरी जैसी हालत और भी बहुत से पढ़े लिखे लोगों की है। ये अलग बात है कि दूसरों या हमारे खुद के अनुभव या अन्य अनौपचारिक तरीकों से हमें थोड़ी बहुत कानूनी मालूमात है। लेकिन अगर हम कोई ऐसा काम करते हैं जो कानून में जुर्म है तो हमारी अनौपचारिक मालूमात के आधार पर हमें दंड नहीं दिया जा सकता।कानूनी जागरुकता हमारे देश में एक बड़ा मुद्दा है। आप ऐसी न्याय व्यवस्था को क्या कहेंगे, जिसमें आदमी सही-गलत बताए बिना गलत काम के लिए सजा दी जाती है? क्या ये न्याय है?


कानून बनते है विधायिकाओं और न्यायपालिकाओं में, लेकिन क्या आम आदमी को कानून की जानकारी दी जाती है। कानून बनाने वाले कानून बनाकर छोड़ देते हैं, जानने की जिम्मेदारी आपकी, फिरते रहें कानूनी पुस्तकों की दुकान पर कानून जानने के लिए, गजट तलाशें या कोई अन्य स्रोत से जानकारी हासिल करें। अगर नहीं जानते हैं और कानून का उल्लघंन करते हैं तो सजा भुगतें। गलत काम करने की नहीं, कानून न जानने की। क्योंकि बहुत सारे लोग गलती इसलिए करते हैं कि वे नहीं जानते कि सही क्या है।पढ़े लिखे लोगों तक तो ठीक है, लेकिन उन लोगों के लिए क्या जो अनपढ़ हैं। क्या उनको भी आप कानून न जानने की सजा देंगे?


कानून तक पहुंच का मामला तो सही है लेकिन क्या कानून तक पहुचकर उसे समझ पाना आसान है। अगर बेयर एक्ट की कापी मिल भी जाए तो अधिकतर लोगों को उसे समझना आसान नहीं होगा। भाषा ऐसी होती है कि उसको पढ़ने के लिए कानून की पढ़ाई करना पड़े, इस़लिए तो हमारे देश में वकालत का धंधा फलफूल रहा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इस बात को समझते और कानूनी जागरुकता की अहमियत भी समझते हैं इसलिए उन्होंने दो साल पहले नेशनल लीगल लिटरेसी मिशन के लांच किए जाने के अवसर पर कहा कि –Sometimes even highly educated people have a problem understanding and interpreting the correct meaning of some of our laws. It is difficult to understand them without the full assistance of a trained lawyer...[this] acts as a hurdle to legal literacy.

उन्होंने आगे कहा था कि - it was the Government's job to make people aware of their legal rights. No one can plead in a court of law as defence that he was unaware of [the] law. This presumption of law creates a duty on the part of the Government to make the people aware of laws. There was also a higher chance of people abiding by the rules if more people were aware of the laws.

सराकार भी इस बात को समझती है, इसलिए उसने साल २००५ में नेशनल लीगल लिटरेसी मिशन शुरु किया, लेकिन जमीन पर अभी भी कुछ दिखता नहीं है. मतलब की आप आगे भी कानून न जानने की सजा पाते रहेंगे।


अरविंद सोलंकी
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मीडिया », यशवंत सिंह », विशेष लेख »

मीडिया से संपादकीय नैतिकता की अपेक्षा न रखें

Saturday 1 December 2007 6 comments

(मेरे मित्र आशीष महर्षि ने अनुरोध किया कि यशवंत जी मीडिया पर कुछ लिखें। मैंने कहा- साथी, आदेश करें। उन्होंने कहा कि ये जो पत्रकारिता का पतन है उस पर कलम चलाएं। मैंने कहा- इसे पतन क्यों कहते हैं आपत? पहली बात की मार्केट इकोनामी के इस स्पीडी फेज में किसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी से यह अपेक्षा करना ही बेकार है कि वह अपना बिजनेस छोड़कर समाज और देश की नैतिकता के नाम पर काम करती रहे और एक दिन अपने प्रतिद्वंदियों से पिछड़कर बंद हो जाए। जैसे अन्य सारे बिजनेस हैं वैसे ये भी है, इसलिए ये जो विषय इस पर जो कुछ भी लिखा जाएगा वो सिवाय भाषणबाजी के कुछ न होगा। पर आशीष नहीं माने, बोले- यही लिख दीजिए। हमने कहा- बिलकुल, उत्तम विचार है, चलो लिखता हूं। और बस, इसके बाद इस शीर्षक से ....मीडिया से संपादकीय नैतिकता की अपेक्षा न रखें....लिख रहा हूं। पसंद आए तो कमेंटियाइए, न आए तो भी। ---य़शवंत)

बाजार का स्पीडी फेज है। ध्यान दें, इनिशियल नहीं। वो राजीव गांधी वाला काल नहीं, नरसिंहराव वाला काल नहीं। ये मनमोहनी काल है। इसमें मार्केट इकोनामी अपने पूरे स्पीड में है। सेंसेक्स कुछ कुछ सेक्स की तरह मजा दे रहा है, कर्ताधर्ताओं को। कंपनियां खूब कमा रही हैं। कंपनियां खूब आ रही हैं। जो जहां हैं वहां अपने हाथ-पांव फैला रहा है। दोनों हाथों से बटोर रहा है। नई नीतियों की देन ने देश को बेरोकटोक बना दिया है। कमा सके तो कमा। बना सके तो बना। दिमाग ला, टैलेंट ला। खूब पैसे दो। और खूब पैसे बटोरो। क्या इन सब बातों से मीडिया अनजान बना है या बनना चाहेगा? बिलकुल नहीं। आजादी के सपनों के साथ अपने विजन को जोड़कर शुरू हुए हिंदी अखबारों ने इस स्पीडी इकानामी वाले दौर में अपना सारा चोला उतार फेंका है। उन्हें ढेर सारी चिंताओं से जूझना पड़ रहा है। मार्केट में एक फील्ड में कई कई खिलाड़ी है। सब ग्लोबल हैं। मतलब टेक्नालाजी में ग्लोबल, विजन में ग्लोबल, कंटेंट में ग्लोबल। और इन्हें ग्लोबल कंपटीटर से लड़ना है या लड़ना होगा। ऐसे में उन्होंने अपने सारे अस्त्र शस्त्र ठीक करने शुरू कर दिये हैं। सर्कुलेशन की वो टीम रखो जो बेहद प्रोफेशनल हो, ग्लोबल विजन से लैस हो, नए चैलेंजेज से वाकिफ हो। मार्केटिंग में वो गुरु ले आओ जो रेवेन्यू को डबल ट्रिपल कर सकें। इसके लिए जो जितना पैसा ले, दे दो। अखबार को प्रोडक्ट बनाओ और प्रोडक्ट को एक बेहद फेमस ब्रांड में तब्दील कर दे। ब्रांड चमकेगा तो प्रोडक्ट खुद ब खुद बिकेगा। ब्रांड कंटेंट से बनता तो है ही लेकिन उससे ज्यादा महत्वपूर्ण मार्केटिंग हो गई है। मार्केटिंग अगर ठीक नहीं है तो अच्छे से अच्छे क्वालिटी और कंटेंट वाला सामान भी कूड़ा साबित होगा, कंपटीशन में। और मार्केटिंग सही है तो थोड़ा कमतर प्रोडक्ट भी अच्छा बिकेगा, दौड़ेगा बाजार में। पेप्सी-कोक को देखिए। माल वहीं है, बस विज्ञापन नया होता है, नारा नया होता है। बोतलों की साइज बदलती रहती है, ब्रांड एंबेसडर बदलते रहते हैं। खूब बिक रहे हैं, खूब कमा रहे हैं। हर साल गजब का मुनाफा ला रहे हैं। कौन देखता है कि इन बोतलों में क्या है। कुछ न सवाल खड़ा किए तो उसके जवाब में ऐसी मार्केटिंग रणनीति छेड़ी इन कंपनियों ने कि फिर ये ब्रांड सबकी जुबान पर आ गए, स्वाद देने लगे।

बात अखबारों की करनी है, इसलिए थोड़ी भूमिका बांधनी पड़ी। सारे बड़े अखबार एक प्रोफेशनल और कारपोरेट विजन से काम करने में जुटे हैं। उनकी संपादकीय टीम इस विजन से अलग नहीं हो सकती। वहां, नये नियम कानून चुपके से आ रहे हैं, जगह बना रहे हैं, लागू हो रहे हैं, चल रहे हैं। ढेर सारी संपादकीय साथियों को इसकी भनक तक नहीं लगती। बस, उन्हें दिक्कत महसूस होने लगती है। पहले तो ऐसा नहीं होता था, पहले तो यह सब नहीं था, ये क्या हो रहा है, किधर जा रही पत्रकारिता....जैसे ढेरों सवालों के जरिए अपनी दिक्कतों को आवाज देने लगते हैं। पर इनका जवाब कौन देगा? जवाब देने वाले कारपोरेट विजन को अपनाने की ट्रेनिंग लेने में लगे हैं। उन्हें यही समझाया जा रहा है, प्रोडक्ट और ब्रांड को क्वालिटी दो। और आज क्वालिटी के पैरामीटर्स क्या है? अखबारों की बात करें तो एडीटोरियल क्वालिटी का मतलब हो गया है... जो पढ़ा जाए। जो पढ़ा जाए भी मोटा वाक्य है, इसे और पतला करें। कौन पढ़े....रिक्शा वाला नहीं, गरीब नहीं, बिना पैसा वाला नहीं.....नौजवान पढे़ और पैसे वाला हो। सबसे ज्यादा युवा हैं देश में। उनको टारगेट रखो। तो आज का युवा क्या पढ़ता है? सर्वे एजेंसियों ने बताया है कि ये युवा नए जमाने का है और उसे पुरानी चीजें पुराने अंदाज पसंद नहीं। उसे राजनीति न दो। उसे समाज की समस्याओं ने गिनाओ। उसे खून खच्चर और गोलीबारी में न उलझाओ। ये सब संक्षेप में ले जाओ। पढ़ाओ पैसे-रुपये, नेट, तकनालजी, गैजेट्स, ग्लैमर, सेक्स, टेंशन.......। और जब ये सब पढ़ाओगे, उन्हें पहले पन्ने पर ले आओगे, इन्हें कैरीकेचर, कार्टन, पैकेज के साथ परोसेगो तो भला कौन नहीं निगाह मारेगा। सेक्स की बातें कोई करता नहीं लेकिन सेक्स से जुडी खबरें सब पढ़ते हैं। बस, सेक्स पढ़ाने और उसे प्रजेंट करने के दौरान साफ्ट रहो, एस्थेटिक बने रहो। देखो, सब सर आंखों पर रखेंगे। गंभीरता बनाये रखो। अखबार को न्यूज वाला लगना चाहिए इसलिए गंभीर हार्ड न्यूज को भी दे लेकिन उसके साथ ढेरों इन्नोवेशन करो। सिर्फ ये नहीं कि मुशर्रफ न वर्दी उतार दी। उतार दी वर्दी, ये तो पता है, पता चल जाएगा लेकिन वर्दी कैसे उतारी....उसकी कहानी बताओ। वो कहानी राजनीतिक शब्दावलियों से न भरी अंटी हो। उसे जवानी दो, उसे युवापन से भर दो, उसे अल्हण बनाओ। लगे जैसे मुशरर्फ ने वर्दी उतारी है तो उनसे कुछ पाया जा सकता है, उनसे कुछ सीखा जा सकता है, उनसे कुछ ह्यूमर निकाला जा सकता है, उनसे कुछ कहानियां बनाई जा सकती हैं। मतलब जो कुछ भी है उसके साथ ढेरों इन्नोवेशन करो।

बात संपादकीय नैतिकता की अपेक्षा की हो रही है। कंटेंट के लेवल पर जब हमने पुराना चोला उतार कर नया पहन लिया है, और ये जो नया है मार्केट ओरियेंटेड है, टीजी (टारगेट ग्रुप) ओरियेंटेड है, इसका मतलब है कि रेवेन्यू ओरियेंटेड है तो फिर पत्रकारों या कंटेंट जनरेट करने वालों से भी अपेक्षा की जाएगी वो नई चीजों को समझें। उसे बहुत जल्दी अपने भेजे में उतारें। उस पर जल्दी अमल करें। और ये जल्दी जल्दी की अपेक्षा कई लोगों को समझ में नहीं आ रही। इसलिए उन्हें दिक्कत हो रही।

मेरे खयाल से दिक्कत नहीं होनी चाहिए क्योंकि पहली बात किसी एक माध्यम से इस नए और बदले दौर में इतनी अपेक्षा रखनी नहीं चाहिए। वजह, हर माध्यम की हर समय एक खास वैल्यू होती है। उदाहरण देते हैं...कभी रेडियो ही रेडियो था। रेडियो में काम करने वाले सेलीब्रिटी हुआ करते थे, अब नहीं हैं। रेडियो की जरूरत नए समय में कम होती गई। उसकी जगह टीवी ने ले ली। टीवी के चेहरे अब सेलीब्रिटी की श्रेणी में हैं। टीवी नेशनवाइड दिखता है, प्रभाव क्रिएट करता है इसलिए टीवी का चेहरा पूरे देश का जाना पहचाना चेहरा बन जाता है। लेकिन टीआरपी के खेल ने जिससे कि विज्ञापन और विज्ञापन से रेवेन्यू जुड़ा हुआ है, इन माध्यमों को ऐसी लड़ाई में उतार दिया जिससे अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इन टीवी न्यूज चैनलों के लिए संपादकीय नीति क्या है। मतलब, अगर आप टीवी में हैं तो कनफ्यूज हैं कि आप को दिखाना क्या है, करना क्या है। जितने भी चैनल हैं वो हर दिन नए रयोग कर रहे हैं। कभी गंभीर कहा जाने वाले चैनल अपने किसी प्राइम टाइम में माधुरी के नच ले फिल्म के बहाने फिल्मों में हीरोइनों के डांस पर पैकेज दिखाने लगता है तो कभी कोई चैनल किसी एक शहर में सीएम के पुतला दहन और पत्रकारों की पिटाई को देश की सबसे बड़ी खबर बनाकर पेश करता है। कभी हंसी और ठहाके के कार्यक्रमों को लाइव कवरेज दिया जाता है तो कभी इतना क्रिकेट क्रिकेट होता है कि समझ में नहीं आता कि देश की सबसे बड़ी खबर किस चैनल पर खोजें। तो अगर कोई टीवी पत्रकार संपादकीय नीति की अपेक्षा करता है, किसी नैतिकता की अपेक्षा करता है तो शायद उसे उसकी अल्पबुद्धि ही माना जाएगा। एक नई चीज हो रही है, जो न्यूज के इस समय के परंपरागत माध्यम हैं- अखबार और टीवी, इनके मार्केट ओरियेंटेड हो जाने से वो जो खबरें इन पर आनी चाहिए थी लेकिन नहीं आ रही, वो अब कहीं और प्रकट हो रही हैं। अब इसे देखना होगा कि ये जा कहां रही हैं। मेरे खयाल से ब्लाग एक नए मीडिया माध्यम के रूप में उभरे हैं जिसमें अपनी आंखों देखी को खबरों के रूप में लिखा -पढ़ा जाता है। ब्लाग में बातें खुलकर लिखी जाती हैं, यहां कोई रेवेन्यू या मार्केट का इशू नहीं है। यहां चूंकि चीजें खुद की नैतिकता और विजन से जुड़ी हैं इसलिए जाके रही भावना जैसी के अंदाज में हर ब्लाग अपना एक कैरेक्टर लिए हुए है। उदाहरण दे दूं...एक साथी ने सवाल किया, नोएडा में कोई ऐसी संस्था है जो गरीब व अनाथ बच्चियों की देखभाल करती हो, तो उन्हें कहा गया कि वो इस बात को ब्लाग पर डाल दें, कोई न कोई ब्लागर साथी जरूर मदद करेगा। तो ये जो काम अखबारों के माध्यम से होता था, अखबारों में फोन करके होता था, वो अब ब्लागों के जरिये हो रहा है। जो गंभीर बहस मुबाहिसे अखबारों में नहीं छपते वो अब ब्लागों पर चलते हैं। नंदीग्राम पर जिस तरह की बहस मोहल्ला ब्लाग पर हुई, असम में नंगा करके लड़कियों औरतों की पिटाई पर जो बातें मोहल्ला पर दी गईं वो मीडिया को आइना दिखाने के लिए काफी है। इसका सीधा संदेश मीडिया को है--- मार्केट को पकड़ो लेकिन इतना नहीं कि बाद में कहीं अपना ही चेहरा आइने में पहचान में न आए। मीडिया पर जो चीजें होनी चाहिए वो ब्लागों पर लिखी जा रही हैं, इसीलिए अखबार अब मजबूर हैं ब्लाग के बारे में बात करने के लिए। लोग शायद इसीलिए इन ट्रेडीशनल मीडिया के बारे में कम विश्वास रखते हैं। अखबार और टीवी से जानी सुनी बातों पर लोगों का भरोसा कम हुआ है। लोग कहते हैं---अरे, इन टीवी वालों का क्या भरोसा, पता नहीं क्या चीज तिल का ताड़ बनाकर दिखा दें। इसीलिए तो एक टीवी चैनल सेक्स से जुड़े सवाल जवाब के जरिए खूब टीआरपी बटोरने में सफल हुआ।

मैं अपनी बातों को समेटना चाहूंगा। कुछ संकेत देना चाहूंगा। बहस आगे बढ़ाने के लिए कुछ प्वाइंट छोड़ना चाहूंगा....
1- परंपरागत मीडिया नए दौर में नए हथियारों से लैस हो रही है क्योंकि उसे एक ऐसे मार्केट में कंपटीट करना है जहां सारा खेल टीआरपी और प्रसार पर आधारित होता है और टीआरपी व प्रसार के फंडे संपादकीय की परंपरागत नैतिकता से अलग हो चुके हैं, इसलिए क्या मीडिया को टीआरपी व प्रसार की चिंता छोड़कर संपादकीय नैतिकता को पकड़ने रखना चाहिए, खुद के नष्ट हो जाने की आशंका के बावजूद या फिर मार्केट इकानामी में सरवाइवल के सारे हथियारों से लैस होकर मीडिया के हर कल पुर्जे को नए अंदाज में ढालना चाहिए ताकि ग्लोबल वार में वे हर तरह से मुकाबला कर सकें, सरवाइव ही नहीं बल्कि चैंपियन बन सकें.....तो इतनी बड़ी चिंता की अनदेखी संपादकीय नैतिकता के पैरेकारों को करना चाहिए?

2- मीडिया के नए विजन को समझते हुए उसकी सीमाओं और मजबूरियों को अच्छी तरह देखते हुए उससे अपेक्षा भी उतनी ही रखनी चाहिए ताकि बाद में खुद को और समाज को निराश न होना पड़े या फिर मीडिया से उसके मीडिया होने के बारे में सवाल शुरू किये जाने चाहिए ताकि वो अपनी मूल आत्मा को जिंदा रखे और बाजार से निपटने की प्रचलित की बजाय नई रणनीति पर विचार करे

3- अन्य कंपनियों और प्राइवेट लिमिटेड की तरह मीडिया को भी खूब मुनाफा कमाने की छूट दी जानी चाहिए या फिर उससे मीडिया होने के नाते उसकी देश व समाज के प्रति जवाबदेही के बारे में सवाल किया जाना चाहिए। जैसा कि कपिल सिब्बल ने एक सेमिनार में कहा था कि इस समस्या का हल यही है कि प्राइवेट लिमिटेड की पद्धति को खत्म कर एक ट्रस्ट के रूप में मीडिया हाउसेज को चलाने के लिए दबाव बनाया जाना चाहिए या कानून बनाना चाहिए

4- जो यह नया दौर है उसमें न्यूज की परंपरागत परिभाषा के आधार पर मीडिया का मूल्यांकन करने और बात करने का मतलब ही नहीं। हर दौर में वैल्यूज अलग अलग होते हैं। आज जो वैल्यूज स्वीकारे जाते हैं वो कभी पाप माने जाते थे। तो उसी तरह जो बदला हुआ न्यूज वैल्यू टीवी व अखबार में दिख रहा है उसे इस समय और समाज का सच मानना चाहिए अन्यथा खुद के दिमाग की खिड़कियों के सही होने पर सवाल करना चाहिए कि क्या बदले दौर में पुराने तरीके से सोचकर हम खुद को ही तो परंपरागत नहीं साबित करने में लगे हैं.

जो भी है, यह सब लिखते हुए लगता है कि आशीष ने वाकई एक ठीक विषय को पकड़ा है। हालांकि इस विषय पर मोहल्ले में दिलीप मंडल जी ने कुछ दिनों पहले एक बेहद उम्दा किस्म का आर्टिकल लिखा था। उसमें भी यही बातें थीं कि लाला से पैसे लेकर हमें क्रांति की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। मेरे खयाल से दिलीप जी की यह हेडलाइन ही ढेर सारी बातें कह देती हैं।

फिलहाल इतना ही
यशवंत सिंह

(लेखक 12 वर्षों तक प्रिंट मीडिया से जुड़े रहे हैं। एडीटोरियल कंटेंट की दुनिया में ट्रेनी से एनई तक की यात्रा करने के बाद अब वे मार्केटिंग व रेवेन्यू जनरेशन का काम देख रहे हैं। फिलहाल मोबाइल कंटेंट प्रोवाइडर कंपनी LiveM में बतौर वाइस प्रेसीडेंट काम करते हैं। एक चर्चित ब्लाग भड़ास का संचालन भी करते हैं। इनसे yashwantdelhi@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है) Read the full story

आशीष महर्षि », रंगमंच », राजस्थान »

जयपुर के रंगमंच को तलाश है एक मसीहा की

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रंगमंच का नाम आते ही मेरे जेहन में आज की तारीख में जो तस्वीर उभरती हैं वो कई लोगों को निराश कर सकती हैं. आज मुझे रंगमंच के नाम पर लोग नहीं जुटते दिखते हैं. और जो जुटते हैं उनकी संख्या अंगुली पर गिनी जा सकती हैं. जयपुर से लेकर भोपाल और फिर मुम्बई तक में मैंने थियेटर देखे. लेकिन सबसे अधिक निराशा जयपुर से हुई. जयपुर में मेरे कई थियेटर के दोस्त और साथी हैं जो अब या तो मुम्बई कर रुख कर चुके हैं या फिर कहीं नौकरी कर रहे हैं. जबकि उन्होंने रंगमंच कुछ कर गुजरने के लिए ज्वाइन किया था. लेकिन निराशा ही हाथ लगी. जयपुर के जवाहर कला केन्द्र की बात को या रविन्द्र भवन की. इन दोनों से काफी यादें जुड़ी हुई हैं. देर शाम तक चाय-पानी-सिगरेट का वो दौर वाकई यादगार हैं. जिसे भुलाए नहीं भुला जा सकता हैं. समय बदला और लोग बदल गए. फिर भी यहाँ रंगमंच अपने को बचाए रखने के लिए लड़ रहा हैं.


रंगमंच की एक कड़वी सच्चाई से मुझे रूबरू करते हुए मेरे एक मित्र कहते हैं कि रंगमंच नहीं दे पता है, यही सबसे कड़वा सच है. अच्छे कलाकार रोटी के लिए मुम्बई की और रुख कर लेते हैं. लेकिन मुझे वो एक आशा की किरण भी देते हुए कहते हैं कि यदि यहाँ (जयपुर) में सिनेमा बने तो कलाकार दोनों साथ साथ कर सकते हैं.

इस बात से शायद ही कोई इंकार करे कि साथ के दशक से ही देश का रंगमंच लगातार संक्रमण काल से गुजर रहा हैं. विशेष रूप से हिन्दी रंगमंच. इसे आज भी अपने अस्तिव के लिए लड़ना पड़ रहा है और वो लड़ भी रहा है. जयपुर में फ़िल्म सिटी बनने की खबर से आशा की एक ने किरण जागी हैं. ऐसे में एक पंक्ति याद आती हैं कि खून तो खून हैं, गिरेगा तो जम जाएगा. जुर्म तो जुर्म हैं, बढेगा तो मिट जाएगा.
....आशीष महर्षि
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बाघों की दुनिया

बाघों की दुनिया
बाघों की दुनिया की सच्चाई से यदि आप होना चाहते हैं रूबरू तो यहां आपका स्वागत है। दुनिया के सबसे खूबसूरत जानवर का अस्तिव खतरे में है। आइए हम सब मिलकर इसे बचाएं।

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Ashish Maharishi

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आशीष महर्षि
Delhi, Delhi, India
एकला चलो रे की तर्ज पर चला जा रहा हूं। जिंदगी में कई दोस्त आए और लगातार आए ही जा रहे हैं। दोस्ती और दुश्मनों, सफलता और असफलता की परिभाषाओं से ऊपर उठ चुका हूं। आस्तिक हूं, यह बात बस पता है। भोले की नगरी में पैदाइश है, साथ में मन बड़ा चंचल तो गले में रूदाक्ष की माला पहनता हूं। सुना है कि इससे मन शांत रहता हूं। खुद को सभ्य समाज में व्यवस्थित करने का प्रयास करते हुए खुद के काम कर रहा हूं। राम, कृष्णा के प्रदेश यानि उत्तर प्रदेश के वाराणसी में जन्म। भोले की नगरी में बचपन बिता। घाट-घाट का पानी पीया। बचपन बनारस और आजमगढ़ में बीता। स्कूली ज्ञान भी इन्हीं दोनों शहरों से प्राप्त किया। बाद में राजस्थान के अलवर और जयपुर का रूख किया। कॉलेज की मस्ती तो नहीं, हां पढ़ाई यहां की। फिर जिंदगी के सफर में भोपाल के लिए रुख किया। यूनिवसिर्टी में पढ़ाई कम मस्ती अधिक की। जब भी अवसाद से घिरता हुआ तो कहानी, कविता और ब्लॉग लिखने बैठ जाता हूं। यकीन मानिए मेरी जिंदगी ही एक कविता है। जितना गुनगुनाएंगे, उतना ही समझते जाएंगे मुझे।
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