Monday 8 February 2010

पत्रकार सीमा आजाद गिरफ्तार

शनिवार को इलाहाबाद में पीयूसीएल की पदाधिकारी और पत्रकार सीमा आजाद को गिरफ्तार कर पुलिस ने उन्हें और उनके पति विश्वविजय को माओवादी बताया ।दोनों को पुलिस ने बाद में मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया और उन्हें 14 दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया गया । पुलिस का दावा है की विश्वविजय मओवादिओं की बैठक में भाग लेने जा रहे थे ।

इस मुद्दे पर मानवाधिकार संगठनों ने पुलिस की कार्यवाही का तीखा विरोध किया है । पीयूसीएल के महासचिव चितरंजन सिंह ने कहा -पुलिस का यह दावा की सीमा आजाद माओवादी है पूरी तरह गलत है । प्रदेश में फर्जी मुठभेड़ से लेकर दमन उत्पीडन का सवाल उठाने के चलते उन्हें माओवादी बताया जा रहा है ।पूरे मामले की जानकारी मानवाधिकार आयोग को भेज दी गई है । इससे पहले पुलिस मानवाधिकार कार्यकर्त्ता रोमा को माओवादी बताते हुए उनपर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का इस्तेमाल कर चुकी है ।इस मामले मुख्यमंत्री मायावती के दखल के बाद वे बच पाई थी ।

उत्तर प्रदेश में मानवाधिकारों के पक्ष में आवाज बुलंद करना पुलिस को रास नहीं आ रहा। शनिवार को एक ओर जहां इलाहाबाद की पत्रकार, मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टिज (पीयूसीएल) की राज्य कार्यकारिणी सदस्य सीमा आजाद व उनके पति विश्वविजय को आंध्र प्रदेश पुलिस और उत्तर प्रदेश एसटीएफ ने इलाहाबाद जंक्शन रेलवे स्टेशन से माओवादी बताकर उठा लिया, वहीं दूसरी ओर तीन फरवरी को संजरपुर में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के सामने बाटला हाउस एनकाउंटर पर सवाल खड़े करने पर पीयूसीएल के प्रदेश संयुक्त मंत्री मसीहुद्दीन संजरी पर गुंड़ा एक्ट लगा दिया गया।

पीयूसीएल के संगठन मंत्री राजीव यादव ने कहा-‘उत्तर प्रदेश में पुलिस मानवाधिकारों के लिए उठने वाली आवाज को हर कीमत पर दबाना चाहती है। शनिवार को मानवाधिकार कार्यकर्ता सीमा आजाद और उनके पति जब दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले मे भाग लेकर लौट रहे थे पुलिस ने उन्हे माओवादी बताकर बिना महिला पुलिस की उपस्थिति में उठा लिया हथकड़ी लगाकर अदालत में पेश किया’। सीमा आजाद 'दस्तक' नाम की मासिक पत्रिका की संपादक भी हैं। उनके पति विश्वविजय, इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में छात्रनेता और बाद में मजदूरों को संगठित करते रहे हैं। जबकि पुलिस उन्हें माओवादी बताकर आरोप लगा रही है की वे माओवादियों को पनाह देते थे ।

पीयूसीएल ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से इस घटना की शिकायत की है। ये मानवाधिकार संगठन लगातार उत्तर प्रदेश पुलिस के निशाने पर रहा है। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर,चंदौली और सोनभद्र आदि जिलों मे पुलिस के माओवादी गतिविधियों मे लिप्त बताकर मजदूरों को गिरफ्तार करने के खिलाफ पीयूसीएल लगातार आवाज उठाता रहा है।

Sunday 31 January 2010

मुंबई हमारा-आपका, नहीं किसी के बाप का

नफरत की राजनीति करने वाले चंद लोगों के कारण दुनिया में हमारी मुंबई की छवि ऐसे शहर की बन रही है जो कट्टर सियासत के कारण बेहद असुरक्षित है। निवेशकों के लिए मुंबई अब कराची, लेबनान या फिर काबुल की तरह एक ऐसा शहर है, जहां कभी भी उन्हें और उनके कारोबार को निशाना बनाया जा सकता है। कभी पांच दिन तक मुंबई आंतकियों के कब्जे में रहता है तो कभी यही शहर शिवसेना और मनसे की अंधेरगर्दी के कारण ये सोचने पर विवश हो जाता है कि इस शहर में जीवन चंद हाथों की बपौती है। देश के कुल आयकर में चालीस फीसदी हिस्सेदारी निभाने वाली मुंबई को लेकर दुनियाभर में जो इमेज बन रही है, उसे सकारात्मक नहीं कहा जा सकता है।

लेकिन ऐसा नहीं है कि मुंबई को सिर्फ ठाकरे एंड कंपनी ही निशाना बनाती है। कांग्रेस सरकार के एक फैसले से उन लाखों टैक्सी ड्रायवर के सामने रोजी रोटी का संकट हो गया है जो बरसों से मुंबई की सड़कों से लोगों को मंजिल तक पहुंचाते रहे हैं। सरकार ने केवल उन्हीं लोगों को टैक्सी का परमिट देना का फैसला किया जो मुंबई में पंद्रह सालों से रह रहे हैं, जिन्हें मराठी बोलने आती है। यदि सरकार अपने इस फैसले पर अड़ी रहती है तो शिवसेना की उन नीतियों को बल मिलेगा, जो उत्तर भारतीयों के खिलाफ है।

मुंबई को अपनी जागीर समझने वाले बाल ठाकरे के एक के बाद एक बयान से यदि सबसे अधिक किसी को नुकसान पहुंचता है तो वहां रहने वाले आम मुंबईकर को। वह मुंबईकर जो दूरदराज से यहां आकर दो जून की रोटी के लिए दिनरात संघर्ष करते हैं। लेकिन नफरत के सौदागरों को यह फूटी आंख नहीं सुहाते हैं। कभी मराठी सीखने के नाम पर धमकाना तो कभी आईपीएल मैचों को निशाना बनाकर कर ये तत्व सिर्फ सिर्फ मुंबई का ही नुकसान कर रहे हैं। साफ शब्दों में कहें तो मुंबई को अर्थव्यवस्था को चंद लोग दागदार कर रहे हैं। यह मुंबई का जज्बा है कि हर त्रासदी में ये शहर और मजबूत होकर उभरता है।

मुंबईकर में ऐसे लोग हैं जो बाहर से आकर यहां बसे हैं। चाहे वह बॉलीवुड के बादशाह शाह.ख खान हो या फिर अंबानी ग्रुप हो। शाहरूख दिल्ली से आते हैं तो अंबानी का परिवार गुजरात से यहां कर बसा है। ये वह लोग हैं, जिन्होंने मुंबई को ही अपना घर मानते हैं। लेकिन शिवसेना के गुंडों के लिए शाहरूख और मुकेश अंबानी गैर मुंबईकर हैं। तभी तो शिवसेना मुकेश तो धंधा करने को कहती है तो शाहरूख
को धमकाते हुए पाकिस्तानी खिलाड़ियों से दूर रहने को कहते हैं।

मुंबई अंग्रेजों के वक्त से देश के प्रमुख औद्योगिक और कारोबारी ठिकाने के रूप में उभरा था। जो आज तक कायम है। किसी वक्त मुंबई अपने पोर्ट के कारण जाना जाता था लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। मुंबई के पोर्ट आज भी देश के सबसे बड़े पोर्ट्स में से एक हैं।

इसके अलावा कॉटन और टेक्सटाइल्स उद्योग के लिए मुंबई विख्यात है। इसके अलावा मुंबई अपने स्टॉक एक्सचेंज के लिए दुनिया भर में पसंद है। वहीं बॉलीवुड के रूप में अपनी दुनिया में अपना लोहा जमा चुके मुंबई में हर वह चीज है जो लोगों को अपनी ओर खिंचती है। इसके अलावा टाटा, रिलायंस, आईसीआईसी के अलावा एलआईसी के रूप में भी प्रसिद्व है।

मुंबई की राजनीति केंद्रीय भूमिका में हमेशा ही रही है। मुंबई एक मेट्रोपोलिटन शहर है, जहां सभी धर्म, जाति और भाषा के लोग रहते हैं। वर्ष 1970 तक मुंबई में कांग्रेस का राज था लेकिन 1966 के बाद शिवसेना उभरी और देखते-देखते वह मुंबई के मसीहा के रूप में उभरी है। वर्ष 1995 तक आते-आते बाल ठाकरे मुंबई के शेर के रूप में सामने थे।

रोजगार, बराबरी, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण जैसे मुद्वे पर बात करने वाली शिवसेना को कभी इस ओर ध्यान नहीं जाता है कि मुंबई में कितने लोग बेमौत मरते हैं। मुंबई में हर साल हजारों लोग ऐसी मौत मरते हैं, जो उस मौत के हकदार नहीं हैं। मुंबई में हर साल ट्रेन से गिरकर साढ़े तीन हजार से अधिक लोग मरते हैं।

मुंबई किसकी जागीर है? क्या चंद चुके नेताओं के इशारों पर मुंबई को जलने के लिए छोड़ा जा सकता है? इस पर आपकी क्या राय है, हमें जरूर बताएं।

Thursday 28 January 2010

आउटलुक के संपादक नीलाभ मिश्रा की मॉं का निधन

बिहार के पूर्व मंत्री प्रमोद मिश्र की पत्नी और हिन्दी पत्रिका आउटलुक के संपादक निलाभ मिश्र की मां विजया मिश्र का निधन हो गया। वह 80 वर्ष की थी। उनके परिवार में दो पुत्र हैं जिनमें निलाभ बडे़ हैं। श्रीमती मिश्र पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रही थी। श्रीमती मिश्र के पति स्व. प्रमोद मिश्र बिहार के महामाया प्रसाद सिन्हा मंत्रिमंडल में राज्य मंत्री थे।

Monday 25 January 2010

वरिष्ठ पत्नकार रामुभाई पटेल का निधन

वेस्टर्न टाईम्स के संस्थापक संपादक रामुभाई मणिभाई पटेल का लंबी बीमारी के बाद अहमदाबाद में एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वह 8३ वर्ष के थे। सांस लेने में परेशानी होने की शिकायत पर श्री पटेल को २० दिन पहले एसएएल अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनको पिछले तीन दिनों से जीवन रक्षक उपकरण पर रखा गया था और आज सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली।

पटेल ने वर्ष १९३५ में एक संवाद समिति से अपने करियर की शुरूआत की थी और उन्होंने १९६७ में गुजरात का पहला अंग्रेजी समाचार पत्न वेस्टर्न टाईम्स की शुरूआत की१ इस समाचार पत्न कागुजराती संस्करण १९८६ में शुरू हुआ। उनकी अंत्येष्टि में अनेक गणमान्य लोग शामिल हुए। उनके परिवार में एक पुत्न निकुंज पटेल और दो बेटियां हैं।